सी
प
ण
भुमित्रानेदन पंत
{~~~
क भारतीय ज्ञानपोदठ कार्ल
ज्ञानपीठ लोकोदय मन्थमाला ` हिन्दी मन्धाङ्क-९§
श्रन्थमाखा सम्पादुक-नियासक ;
दण्ष्मीचन्दर जैन
॥ 1
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ऽषएपावारत पकक ए
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एषा २७.35०
॥ ^
श्रकाशकं
मारतौय ज्ानपीषट कोशी
य॒ुद्रक
मन्मनि सुद्रणाख्य याराणमी
तीय संस्करण १६६३
मूच्य सादृ रीन श्पये
[|
विज्ञापन
सौवि श्रन्तर्गत मैरे दौ कन्व-र्पक संशीति है, जो
श्रपने संतति स्यमे त्राक्राश्काणीति प्रतारित ह्ये चुके है । "तीकं
का रवमाकाल मारच ०६५४ है करीर स्वप्न छरीर पत्य" का मवग
४६ ५९।
१८७ वी०, रष -सन्तानिदन पव
इखाहाबाद
४
द्वितीय संस्करण
इत संस्करणमें ^दिगिजयः नामक न्यीन कान्य-र्पक भी जोट
दिया यया ह, जिका प्रेररा समे गूरी ययारिनकरी श्रन्ति यात्राते
मिली ।
१५ फरवरी १६२ } -सुमिव्रानंदन पंत
वंधुवर
श्री रामचंद्र ठंडनको
सप्रेम
सौवर्ण
( सक्रिरथिकातीनि भातिक-भूल्योकि विकास प्रतीक ५४)
स्वदत
स्वती
देव
देवी
क्वि भ
सौवण
अन्य स्री-पुप स्वर
[ ऋ
सविण
[ युगांतर सूचक वादित्र संशौत ]
[ डमरु ध्वनिं के साथ नेपथ्य से उद्षोपं ]
पमूभि मेँ शोभित मौन हिमाद्रि प्रेणि्यौ
विदि सारछपिकर संचय सी धित शुम सनातन,
दिग् करिराट् यह दशय योग्य अमतेके नि्व्य /
प्रट्किमा कर रहे देवगण धरा शिखर की
अर्ध श्रमोचर, जयमय क्यातप मे भषित :
श्ल मधुर कंडे से रति दिव्य क्द्ना
नव्य युगात कामन मे संकेत पा रह
शंख षट कणा प्रदेया यंर्वं वजात,
किविरियो के सण शिविर ऋते नीद्जन :
अ्रथम सुनें मंगल स्तव श्र॑वर प्रथ मे रंजित,
श्रवण करे फिर श्रमे का योपन संमापण (
दम्ब धंट वौणा मृदंग आदि का उल्लसित धोप
मू
१०
[ देवताओं दरार स्तवन ]
जय हिमाद्वि, जयहे!
जयति, स्वर्ग भाल श्रमर,
जयति, विद्वि हृद्य शिखर,
जयति, सत्य शिव संदर, .
शश्वत अक्तय हे ।
पुख्य सेत, देव॒ निलय,
संसृति के शुचि संचय,
श्रा सोन त्भय,
शुभ्र शांतिमिय है /
धरा चेतना निखार,
जन मन के ज्योति ज्वार्,
सयम तप सुकति द्र
विर मंगलमय हे!
विश्व हात) करम विकास,
उर मँ करते विलात,
कौटि सूजन प्रलय लातत
सुख इख अभिनय, हे ।
१ का
स्पा्रण
पावन पुर वारि निसर
उर मे सिम रय मर
भू रज रखते जबर,
जह चित् परिणय हं!
केवल, भाखर, अमेय
ध्यानावस्पित अजेय,
जीवन के चरम ध्येय
चिन्मय, तन्मय हे!
हरिति श्रवनि मसिति श्र,
रहत कलामय मयंक,
काल व्याल से तिरक
गरतयुंजय, जयहे!
उद्वत कौन प्रम लच्य
मनश्चत्त॒ के तमत्त 2
उर्व राण मौन वत्त,
सुर नर विस्मय हे।
१२
[ स्तवन के उपरातत देवगणो का संवाद ]
देव
निरृत याम यह मध्य निशा क्रा, गुह्य तमसमय,
गहन अचेतन मन सा, रहत मीन से रेखस्ति, -
भूत निशाही देव जागरण की वेला भी!
तल मृक मय नीचे, ऊपर नीरव विस्मय,
महा प्रहति विश्राम कर रही सम-कत्त मे
रज सत तम हों लीन जत्स-विस्मृति के प्टमें।
कसा निषिड तिमिर छाया यह, महा दिशा के
केशजाल्ल सरा महकल के वक्तःस्थल पर
गाद लालप्राओं के च्रवतो मे लहर.
छजन हप के अति फश्च मे वैरे इदे ज
दिव्य तमस यह दिव्य विमा मे ल्येया वितरत
दीप्ति कर मय विस्मय कौ त्रा प्रतीतिते।
देवी
शुक्ल प्ह्त ; नवमी के राशि का सोम्य पाश्वं मुख
मौन मधुरिमा, आमभिजत्य गरस्मि मेँ मंडित,
नीरव सम्मोहन वरसाता च्रतरित्ति से
द्न्धकार के निसिल्ल जयतत का केन्द्र विन्दु बन,
छरतमैन के शात मुकुर सा विर तेजोमय ।
हिम शिखे पर अतिष्वरनित्त शत रत रशि
श्रात्म चक्ति च्राभाओं में प्रतिफलित ह्ेरही
दौक् प्रेरणात्रो खी, निस्वरं उन्मेषो सी.
कप उठती यो कोटि कडित हर्पातिरकि ते.
स्वतः स्फुरति जलत उठती जगमग वन त्रपि
विना पंठब्यो के पुष्यो सं शत वणो मे,
इद्रधगुप-पखों मेँ उड कर स्वम दूत मव
विचरण करते अत्ट्केतन मनोभूमि मे
श्रदुत वातावरण उपस्थित रहस सृजन का!
१
स्वग
कका)
मात्रग
पर्यय क्त (धिनः यट : ऊद् षै
पते पररा के^ममर क्षण, उर तन॑
प्राण पाध छा मलय सेए गत स्ति द
जण भार् सै, घ्दय सुक्तक्टुः मृश्च धाक
उपचेतनः म गोपन श्रुट एद चापो मे
मौन प्रतीत्ता, श्राया दा सयात वहन कर ।--
निर्जन षन मे गज उठी लय सजन व्याक!
रजत कुटि म विष्ट कियो को सिम
अर्धं सुली पलके हं उटती सखम जयत मे,
माम हनि प्रम मे हव गया दियत मन
प्रतस्वेतय दृच्म युवन हयौ रहं पष्ठवित,
रिष्ट संकमणवेला मू मान्छ प्व की!
देवी
प्रधिमानत फा रतत सट्टा जाजल्य, स्् लित
यशऽकाथ चतन्य का शजर < प्रतर्मन का
परार तच्छ > मानव संस्छति फो अमर दाय-धन।
भित्के शिले एर जरा तै कर भर
य॒त यत रत वट कटरा क्न की,
जन्म अभी तै त्का नही जो मनोटुह्यमे।
जन के प्रतर्जविन का इतिह अलोक
पंजाभित हृ इमे, युग युय मे विकतिति,-
मृद्म जगत कै सोपानं मे उट अतम ।
देव
प्राज मेवल चतना राकया जन्म गहण कर्
स्यति कति हुपमा छी सरणिम् निर्मरिणी सी
१३
नव स्वर लय गति मेँ निन्स्वर गृषुर् मंह्तकर
रमि रफुरित छ्रंतनभम से वतरत लये रही
ध्यान मोन इतत तपौभूमि के रजत व्योम मे !--
जन श्रद्धा रिश्वत, चेतना कौ साधं
जहो सत्य-परिणीत पर्वती परमेश्वर से!
देवी
कोटि लक्त युय वीत गये, जव निस्त जल रे
स्योति स्तभ स्ना निखरा था चैतन्य लोक यह,
शामैः शनैः उठ, उर्ध्वं माल पर धारण करनिज
रपि शशि तार जरितं मुकुर स्मिते आत्मतेज ऋ ।
साति, समटो, भकिक्रो क युग मरे दृह
विकतित्त ह्येता रहा गुह्य श्रंतत्य कट यह,
मर्म गंजस्ति इसकी प्राणों द्री द्रोणी में
जीवन वेमव रहा मूलता नव शोमा मे!
देव
नया सारछतिक वृत्त उदित हयै रहा क्तितजिमें
मानव जीवन मन का नव स्पत करनैः
नव संगति मेँ संजो परिस्थितियों कीमू कौ;
नवल संतुलन मर वहिरतर के यथां मे!
नमी का मणि कलश, पूरं चैतन्य सुधातः
स्वम द्रषित राका वरताएया मकविप्य की,
देव टि श्विक्रिम कर चुकी मनुज के मनको,
सक्रिय किर से दिव्य चेतना, नव्य संचरण
गुह्य वद ज्योतिर्तर्मर सा युग-सचेट अते,
जम भ्रूकौ मन्ति कने जीवनि शोभा मे!
देखो, वह. स्रुत उतरते समन पव सितः
चान्न, हम विधाम करे ध्यानावस्थिति हौ?
वा;
साच
हका
सात्रण
{ देयो का अत्यानि होना - स्वदत का प्रवेश ]
स्वरदूती
श्रो नभचरः श्र सैचर, क्या समो मे जाग्रत्
भाव पं थक यवे तुम्हरे ? कर्य दपि हो?
स्वदूत
मद तो, येचरी, क्या क्रुः इन श्रमो का
नित नव वम्र देख, टि श्रपलक रह जात
वरस दही समो कौ जयमय नीर शोगा
स्वर्थिम पंवष्ियो मे कर कर चंतनैभ से,
चकित रह गये लोचन दण भर व्योतिमृढृहो,
[ प्रसन्न वाद मंगीत्त ]
यह च्रम्ये का पुण्य पाम्, गोपन क्रीडा स्थल,
सूक्ति चेतना, दजन रतिं के प्रतीक जो:
राज श्रतंद्रित मननसर्गं के बत्ती सुर्यण
तपोभूमि मे हिमवत् की समवैत लये रहै,
कृत्यातर का रहस समय तक्निकट जानकर
हम जिनके नव युग के प्रतिनिपि श्रपरून है।
स्वरदूती
रहने दौ इन ग्रतिक्रियत्रादी देको कौ,
मृद मनुज को. खम पलायन तिचलति जौ!
श्रात्रो, हम भू अरमण करे स्मित छायाप्थते,
जन युग की नव परिणति दले मुज लोक मे/
स्वदूत
क्का ये पौराणिश्च प्रयोय अव भी सेभवहै?
¶५
सवर्दूतो
सय दृठ ससव है प्रगल्म क्ल्यनाके लि्,
जो विचत् यिस, चु जव स्ते वेगी है।
नये प्रयोगो का यह वन्नानिक युगजग मे,
वायुयान से उद इस युय का मौतिकि मानव
देवयाने मँ विचरण करता शव, शर॑व के
म॑धित उर को वत् पसो से वदी इर!
[ प्रखधष्वनि ओर् मं्ोच्चार् ]
वह देखो, सित श्रधित्यत्मा श्र॑त्मनितत की,
चऋपियों के पावन श्चाश्रम सी, मौन व्यान-रतः
नीवार फ ठेर लये मीव चिन्तन से,
लटके धुले कषाय, साधना विरस चित्त से;
लिपे पुतते तृण प्रांगण सुधरे साधिक मन से
यन्न धुम, मंत्रच्चारों से लगते धूमिल।
विचरण करते यह मृगो के छौने जव भी
निज बोध विस्मित चित्तयने से देख जगत कौ
सीगो से सहला मुनियों के समापिस्थ तन।
ह्य श्रासद्र्णा तापसं वैठे निजने मेँ
पद्मासन स्थित, केद्धित दग नासाय मायमेः
श्रारोहण कर रहै उध्वं धरणियं मनत फी
प्रणो की सतर क्वाय दील कर निविल,
तन्मय, विष्व क्रित, च्रखंड ब्रह्माड सत्य को
वोनि-ता शेगृषठ मात्र परा, आप्त काम मन!
स्वर्दूत
वनसा च्चंयुष्ठ मत्र? यह विडंवनाहै
मानव मन की निश्चय, जौ चरति मविप्रषणदहे,
षर को सायर मेँ मल्ति करने के वद्ले
सायर की वोधना चाहता सीमित घट मेँ!
सौषणे
पपौवर्ण
प्रलिले प्याप्त सत्ता कै सक्रिय श्रम प्रत्यक
च्रात्म ख्य मेँ परिणत कर निखिय सारततावत् /
हाय, श्रव को संमव करने कौ निल
चेष्टा मे वह हद्रजाल रचता जता चवे!
स्वरदूती
वह देखी, व्ह मू जिन की धाटी नूतनः
च्रधकार या जह्य पोर, विचत् श्रा ते
जगमग श्रव वह लगती नव नक्तत्र लोकता
यहा मनस्वी मानव श्रथ िर्त्तण पथ से
उद्धारित कर मूक प्रकपि के रहत वत्त को,
भीति जग के ग्रहन रहस्यो की श्रधिक्त कर
जुटा रहै मानव भावी कै उपादान नव!
श्रि मर्य के दास्ण पंख कौ छ्र्पु
उन्हं असत कर रही, स्वैदं से रिचि उनके
रचना-ध्रम को छीन, श्रपरृत को बदल गरलमे/
चाज नाश री मुद्ध मे वदी विवश सृजन!
स्यरदूत
कही नितांत कमीहै इतत वरज्ञानिके युग म,
एक शरीर है महत् मुज का रचना संचय,
अर दूसरी अर धृत् खाई चमाव नी
मध्य युगो फे अभिशापो से मरी मयानकर
रूह रीति ोपण कै कर्दम करा ह वये.--
मानवता के उर मेँ पधी ध्रणित ददर सी,
अभी पद्लनाः मानव कौ मति वाह्र से
श्रतिकरिम ष च्रपनी सीमाच्रो के संकट क्र
वह दैखौ, समतल प्रमा एला दग सम्युप्र
जहां पस्पध जनयाम, नयर्, गृह, ह्य, राजपम
मृण्मय प्रतिमानं से वरे पियत युगो रै
उपचेतन फे मान-चिघ्र तै श्रत्तव्यस्त जौ:
मनुज सभ्यता की चापो से प्यनित श्रवनि पर्
व्यो मरिटते पदविशेषो कात प्रथिक के!
वहु देशौ मँ राडिति ल्द धरा करा मनत
श्राज ध्रृणित सर्पाश्रो, स्वाथों चै श्रात॑ङित,
पनीत ह्यती षिनारा की मरीषण चाया
जन मृ केमृस एर विषाद राशय ते भदी।
मडरा रहे बय मीम पूमाक क्षििजि मेः
लगता हरित प्रतार सिन्धु सा श्ांदोलित श्रव,
श्रावैश्नो से उद्वेति उद्ात नागरिक
नव्य युगात का श्रव्राहन करते भर पर
[गीत]
पुरुप स्वर
एक उत्त हुव्रा रप,
वत्त रोप, वत्त रोष
जन मन मे ममरमर
नव युग करता प्रवेश!
वृत्त शेप
[अ
श्याष्रण
स्त्री स्वर
युग क्विति प्रहर षोर
» छाया तम चोर कीर,
दूर च्रमी दूर मोर
सि केषिति मू प्रदेश
षच येष
पुरुप स्वर्
परावके करा लोक अमर्
आकुल करता अंतर,
मृदु धूम रहा शहर
गरजता क्तिपिज श्लेष /
वर्त रेष !
स्त्रीस्वर
विद्रा ठे क्लात नयन
स्मृतयो सै उपचेतन,
मान्त में युय स्पंदन
प्राणो मे न्वोन्मेप ८
वृत्त रोप
पुरूष स्वर
विहर रहे सूम यवन
कीवन रज नव चेतनः,
धरते नव॒ सखप्न चरण
भिटने को दैन्य क्लेश?
वरत येप
पौवरणं
[ सभोत ध्वनियां धीरे-ोरे य होतो हं : नागरिको का संवाद |
२०
एक पुरुप
करति, विप्लवो, मू युद, ण्ह संपा से
घ्रस्तः क्तम्ध; युग-्रादीलित अच धरा केतनाः
भूमि क्प शत दौहरहेदयेभू मनत में,
कैसा दारुण युय च्या निर्मम् विनाश का !
ध्वस्त ह रहे तंस्छतियो के सौध रल-स्मित्,
भृ लुंडित स्ति शिखर ज्योतियिख छदो के,
नष्ट श्रष्ट संगठन सचेतन मानव मन के /
धर्म, नीति, च्राचारे गिर रहे त्रौपे यह दहे,
हसप्ुख तम सै मरे अतल कामनाकूप मे /
बुद्धि आत, जीवन के श्वे से चेच,
माय रहय मन वहिर्जगत के जलते मरमं
मुग मरीचिका पीडित, चल जल छाया मोहिते!
स्त्री स्वर
पिहसिन लुट रहे, टूटते छत्र रत भ्रम
ज्वलित तारको ते मू रज पर; रूढि रीति के
दुगं दह रहा भीत क्ट्वा के यदू
भिल्ली सकत । उथल पुथल मच रही धरा के
जीवने प्रागण मे, दारुण समा कंपति जौ !
घधकर रहे उपचेतन के गत उ्ालासु गिरि
युगा युय के आवेश की लपटे वेर कर,
भीपण छायार्रों से उद्रेलितत जन मन तव ।
का;
सारण
ऋ न
~ इस पष्य 2 द 9/4
पलित्ति हयो रहय" वास्तविकता जगती कौ
नव स्यो मे अट लो रहय जीविन श्वत,
विश्व विवर्तन को धारण करने मे तत्तम!
शात तथा अनित्य ब्रिरेषी तख नही ठौ,
ष्क सत्य यी तिषिष सस्यं मे श्रित;
प्रि्तन की च्रिच्विनतः ही शाश्वत है,
मूत मधिप्यत् वर्तमान है यंकि जितमे,
जीवन-सक्रिय देश काल मे विस्तरत गावत,
सश्ियि आज परिस्थिति्यो सी द्द चेतना,
यहि शज्ञिनो से नेव वल संचय कर!
यदल रहा जीविन यथार्थ, मानतत-पदारथं श्रव,--
मत्र मानव मूल्यो मं दुपुमित सामाजिकता
विश्व बरिपमताक्रो मे नवल समत मर रही!
स्तरीस्वर
महत् अयोग धरा जीविन में आजे द्ध रहे
एक वृहद् भू भाय रक्त कर्दम ते उरक,
दैन्य, निराशा, क्षा, ताप क णित नरक के
भधकार को कर. विपमता क्री करा से
वग॑युक्त हो, तरमपां सखो सायो की
रह वर्यं र, मध्ययुयो की जिन जजर
प्रपरान्नो कौ स्रीमादं किन मित्र करः,
भ जीवन की मर्तं रेणा से उन्वैपित
श्री समत का धरा सप्न निमाण क्र रहय
जन वल्ल की संगर सीह संकल्पय शक्ति से!
सौवर्णं २१
पुरप स्वर
युग-युय फ शापो तापो से रोषित जनगण
मानवतां कौ लोक कल्पना से शनुग्राणिति
मृतमिन कर रहे धरा के प्राणखप्ने क्रो {
निखर रहे नवे रजतं सूत्र जन सेवंधो के,
नव॒ प्रणालियो के स्र्णिम ताने-वाने मेँ
नवल लोकजीवन काष्ट हो रहा भू व्रधित।
श्रादो के दति लोक नेव उदित ह्य रहे,
जने संस्छति का अस्णोदय प्रा्ताद उट रहय
सिन्ध ज्वार सा सुक्त प्राण, रवि राशि प्रह चुंषितः
खील दिगेतों के बतायन स्प्न मंजर!
[ मुख वैभव द्योतक प्राणप्रद वाद्य संगौत ]
स्वर्दूती
बह देखो, वह उपत्यका, सोन्दर्थं॒पल्लवित
मौन चांदनी चिल्ली जहाँ जीवन स्वपनो की ।
रजत धियो से क्ते परिव सुरत्तित,
सौरम से श्लथ वायु मनोमावो तै युंजित ।
क्लश्नार है जुटे बर्हाः श्रुति युग चेतनं
संवेगो के चूद्म कुहातों मँ जौ लिषटे,
नीरव पौ फटने का सा मादव है युख पर,
स्प उनीदा पलक, मावोद्रेलितं अंतर,
संभाषण कर रहे सुनी वे, वादौ मे रत,
च्रात्म दर्यं ते पिरे, व्यथासेजय की पीडित!
[ काद विवाद का कोटादृख - आकाश मे मंदरि हुए तोतो कै स्वर,
रेरे
जोगाँडव्छेसयू, गोड च्छेसयू दुहराते ह]
[ ऋ)
सवण
[का
साक्ण
सवरदूत
ये प्रश्विमि के मध्यवत्ति योदधिक संभवतः
मानववादी परपया कै नव चअधिनायक्ः
जनवादी तत्रो मै जीवन से विभीत ह
द्वि खप्न जो देव रहे पीडति पलकों प्र,
व्यक्ति मुक्तिक कामी, मोह विशा मेँ निद्रित !
नि कृष्वमित बाणी से ये जाकपिति करते
मनोजवो के मधु लोलुप मधुकर मन को!
स्वर्दूती
सनने दो क्या कहते वे युग मंच प्र खड!
एक वुद्धिजीवो
मित्री, पोर भयंकर संकट क्षी स्थिति है यह,
मानव संस्छति यान द्वन करौ श्व ति्तल
जल ततं मेँ, जन जीवन ज्वा से श्रादोलित।
यह केवल प्रार्थ ने राजनीक्कि ही संकट,
जीवन के मौलिक प्रतिमानों का संकट यह
श्राज उपर्थित जौ मानव इतिह्यत में विकट,
वचित भसत नह्य कला साहिल त्ते मी /
सामाजिक ह्येती जाती छव अयति भावना,
शिषिध मतो, वादो, दलयत स्वार्थो मे सो्या--
सामाजिकिता आज वाहुवल पे है श्ापिति /
[ उच्छ्वसित होकर ]
मेड्राते अपल्य विहियम युक्त गगन मे,
गहरा धूमिल छायां जन धरणी पर,
धोर् प्रलय के मेध उमड़ते अंतस्तिमे--
५
[ सहनृए हतवार् दोना ]
नेष्ट
दूसरा स्वर
सुनिए्, मै समाता हँ इस युग संकट को,
ठ्द कंठ हो गये सुद् मावनविश से!
{ जनते का उच्च हास्य ]
दौ प्रकार के दारुण संकट श्राज स्रामने,
दोनों क्ते पर हमको संयुक्त जरना ।
एक, जनों को धरा स्वर्गं का अश्वान देः
संप्रति भय, च्न्याय, यातना सहने कौ
वाधित करते उनको वहुत्रिषि ऋतंक्ति कर,
बुद्धि विवेक विहीन वना मानसजीवी को,--
कूर संघ स्वार्थो का साधन वना मनुजकरो!
चरर दरे, रिक्ते शृन्य मे पं मार क
उपर ही ऊपर उडते हं ज्योति च॑ध टो,
स्वर पलायन पिखा जनों को श्र्विन्नात में!
दिव्य स्वाति के पीपी रटते प्याप्ते चातक
भावीके आक्राश कुसुम निज चु मे लिये,
कुम्हला उठते जो जीवनके शीतताप से!
स्त्री स्वर
सचरै, यह दिनिके प्रकाश साख्यं स्पष्टे!
दोनों हयी मृदु प्रलायन वतमान से!
सत्य भविष्यत् नही, भृतमय वतमान दहै,
वह) मिप्यत् होया जिति वनर्पिगे हम!
वर्तमान, जौ पि चरती करी परपरा का
मृतं स्प है, वही सत्य है, वही प्रयति का,
युम विक्रार का मापदंड है-यह चक्राय हं!
जसा मने कही पद्म-हम जो जीते हैः
हम्ह सत्य हे ! वतमान क्षण के पट मेही
हमे बवोँधना होया जीविन के शाश्वत कौ!
[ करतन् घ्वनि ]
सीवणं
दुसरा स्वर
यही सल है ! सुनो कुश्च, हमको दोनों
प्लायनों ते लडना ल्लेया, ज भविष्य के
मर मरुये मेटकाते मनको / मृल अयति कै
नही शुष्क चामानिकता मे, जो दल शित,
नित नवीन च्वि सै उत्तेजित रहती!
मानव मृल्यो का है स्रोत मुज के मीतर्,
जीविन मर्यादा मे विकरित सहन व्यक्तिमे !
श्रस्थायी है जन जीवन फ मूल्य वहिर्यत,
विड कर दिया यह युगके ट्विह्यसनेङषर
यात्रिक, जन ततरिक प्र्रोय वहु कर जनमनमे(
स्त्री स्वर
श्रत्म संल्य जो हम सर्ति के अग्रत है,
मानवता के ज्योति शिसा वाहक युग युग के--
गहन समस्या श्राज हमारे निक्रट उपस्थित
कैसे हम च्रं के कर ते छन श्रषत-षट
दैवो फै हित करे सुरक्तित, युग येया की
सुधा पारकरो दिप श्रवण पुट मे फिर श्रपनै,
देश-देश का मानस वेम संचित जिसमे!
यह गौरव प्रधि तदा से रह्मा हमारा,
हम जो काल प्रहु, अल्प सेस्यक्र जन जयके,
वहन करे हम धरती पर सदेश सर्गं का,
मानव मूल्य की मर्यादा को क्ितित कर।
प्राज जयत फ सम्पुल प्रद्युत जटिल प्रन यहं
साध्य श्रीर् साधन हो रे सखुं तसमनित।
पुरुप स्वर
सामूहिकः वर न कर दे व्यक्ति व्यकषि की
स्वतंत्रता, सक्त्य रि; उचत विवेक को,
२६
इसमे पिले हम जो इने गिने मानतः
हमें संयदित ह्ये कर श्रव तत्पर रहना ह
निज महान दावित के लिर्, भू मंग्लदहित।
हम थोड, जो जीव्ति है, च्रस्तिलवान है,
हम्ह सत्य है, शेप व्यर्थं मूनार मान है--
क्योकि नही परिचित वै व्यापक भू जीवन से,
विश्य सभ्यता की गति ठते, मानव संति की
सृ, रहस्यमरी, तति जट्िलि विकरात्त सरभिते।
प्रथम स्वर्
मुभे वोलने दे अव, मै च्श्वस्त ह्ये गया!
मित्रो, मृल्यों का उद्धार ह्म करना अब
स्न व्यक्ति के भीतर उनको स्थापित फर हिरि!
हमे विशि मनुष्य चाहिष्; जौ प्रतिमा के
पयो मेँ उद सक्ते मन के प्रैतर्नम मे,
स्व्गेया सा जह्य उत्स मानव मूल्यों का
चिर नारि सै छर॑तष्हित स्मित क्ावा-प्थ मे/
श्रल्प संस्य कुच ही हम कर् सकते श्रवगाहने
उत्त अन्तःपलिला धारा मे श्र॑तश्वेतन (--
गुर्तम युग दायिल हमारे श्या को षर
श्राज श्रा षडा, हम जोमू के मारवाह है,
निलिल विष्व जीवन, चिन्तन, सौन्दर्य, योध के
निरवधि त्रायर का मंथन कर, वर्तमान कै
च्तीर फेन से मानव मूल्यो की मर्यादा
सार स्प मे संचित कर, उस्र जट्लि सत्यको
निज विवेक सम्मत स्वतंत्र संकल्पय शक्तिं से
छजन कर्म मेँ परिणत करना हमको शाश्वत (--
विङ्त प्रचारो भावावेशो से हत, मूर्ति
शब्द शक्ति का नवोदधार कर, नव मूल्यो को
उते प्रतीक वना, मार्जित स्ति से संवार कर्
मानव के मातर् करना है हमें प्रतिषि (--
चहिरंतः का शुष्क समन्वय भम है केवल!
तीसरा स्वर्
कैसा दमित शब्द जाल है । सुंदर बाग्दल ।
स्प्रीस्वर
कायरता से वचना है अ्रतिभिवानों को!
कायरता से भस्तं रहय इविहयत्र मनुज का,
कायर्ता ते व्िसुल हुश्रा अतिदुय मे मानव
निज अंतर प्त्योसै, सकी एकार से?
वतमान मे हृद रहकर वहते अतीति का
मूर्तं स्प स्रत क्षण जौ, उत्करे ग्रति जायत्,
हमको नंज निज स्थिति ते पुनः सधर्मकेलिष्
श्राल यन्न॒ मे पर्णति देनी है-
तीसरा स्वर
उफी
लीक यन्न कह, नव मूल्यो का ज्योतिकाह् वन!
सामाजिक्रता निगल न दै निज वर्तमान के
स्तो कै प्रति जायत् वोद्धिक गर्गं व्यक्तिको
जी छाया सा कोप रहा जन-भय से मूर्वित,
सावधान रहना है दहमके--
एक स्वर
क्रया वक्तेद्धे?
तोसरा स्वर
सामृह्िकता कृच्ल न दं वि्मृतत अतीत की
परपरा के हम पथराये दे क;
हमको रहना है ` स्तक, संयखित--
१;
सत्रिण
२७
1
स्य्रोभ्चर
तागगा स्वर्
हमने शपनं ए मीत ये गुण उीणन्
जटिल अले द वृचा जहिता स निम, विषै
म्यरतिम मर्यादो क त्र पमे ओ
मदौ ह दम पि सथं ष उटना चौ
श्याल मात नौ रिम आत त दुरात् षय
जग्मय फर उट, शरि हिरण म गरम्भोहिति 1
भाव जगते यह् मूढ स्वदि फा, मृदम्, गृहन, तते,
जो क शरगुदर् सण > रुदर फर द्वा
निज प्राणो छा रा उट्ल कर् शयेन गै /
ह्म, धन) नये प्रकोय फर रहै मानपमनमे।
स्प्री स्वर्
प्यग्य मत फरो, बंद रा--
एकः स्वर
गह प्रच क्ता हं ।
तोमरा स्वर
यह विरोषं श्रपिक्षर सदा ते रहा हमारा,
हम जी चेतन श्राण, शल्य संस्यफ़ हैँ जग के,
हम नेव युग सदेश वहन कर अंध धरामेः
अरवाह्य सै जनमद को रहे हके,
मानव मृत्यो की नव मर्याद घोषति कर!
जन धरत मे फएलती नही सुग्हली सरति,
वह उगती कृद इुद्धिजीषियां फे मानत्तमे,
केर क्री क्यारी हसती व्यो सर्य मे!
ॐ
साक्ण
एक स्वर
इसे चष केः
दूसरा स्वर
हसे पकड लो, सत जाने दौ/
स्त्री स्वर
यह कोई मेदिया, युचर लगता निर्य ८
[ द्न््र कोलाहट ]
स्वरदूत
यदि पएू्लो करी रत शिरां उत्तेजित हं
तो उनके सुख वचर्मक सकेगी कमी सूर्यं सं?
पै भिस्त कर पायेगी धरती के तमको
हातोन्मुव संसायं का उन्माद मात्र यह!
तर्कजालसे यदि किकृहित होता मानव सन
तो न प्रनपता तठ्-जीवन श्राक्रश लता सै?
महत् भाव ही सन विभूषण मानव मन के,
मुकुट पष्य ह पहना सकते तर शिखरो कौ /
स्वर्दूती
उधर चले श्रव सेचर, ह्मि गरा फार कर,
देख मलयज रुरित स्वागिम शस्य भृमि फ,
सदा विश्व केयुग्धद्णो की स्नरही जे!
स्वदूत
पलक मष्ते पटु गये छ्लौ, अपने मन की
शछ्रभिमत मू पर~-तफल कटो शरद श्रपलक लोचन !
9
ते
9)
स्वदत
जह्य, दासता यस्य हस्ति मृ मरत मिनी,
मौन यंजस्ति से लयते गृह गज नयर् पन
शमर विङ्व सायक कौ मदः स्वर तर्ही पे!
य्य महन् सान्स्तिक संचरण अम्य लं रहा
मानयीय गरिमा मे श्रवितिमि फर् ठम युग करा,
हदय स्पश करम मे प्रास मणिना सत्तम ~
जौ ्युतल गे उटा मनुज कौ मानम तल प्र,
अगिशो से सत्य शील संयम के स्तर प्र,
सम्य चेतना से गिज विसिमित करता जग फो !
सृति प्टपष्र नव आमा रेवारी चङि
प्रकट हु्रा युग पूर्य श्रमी टत प्रय भूमि मे,
जो अनादि से देवको भ्रिय रही शिम!
जित्तशी मनोगुहाए जनेश्रडा से दीप्ति
जीवने पावन ररह, छरविदा तम से वंचित,
उपचेततन निर्चेतन स्तर तक श्रालोक्रित ही!
य्ह असत् १ सत् की, तम पर ततत स्योति की
तथा मलय पर विजय हुई श्रमृतत की महत् (-
स्वर्दूतो
य प्क सते ज्योति प्ता उखकर हसा
युय मानव वह लोक सत्य से श्रनुप्राणित दे,
संयमत्तप से दीप्ति, शछ्रात्म स्मिति सदाचार की
रजत शिखा करमे धर, वर्वर हित जगत्कौ
महत् साध्य च्रनुर्य दे यया जौ नव साधन,
प्रेम अस्र ते जीत घ्रूणा को+--स्यितप्रज्न मन
युद्धो से हत जर्यर भू प्र विश्व च्रेयहित
सवल हिसा के म्योय कर जाभ्रत् सकय
सामूहिक स्तर. प्र+-जन मन कों द्रे सुत्त कर!
सौचयणं
सौवर्ण
छ्रत्म शक्ति से जभ संगठित पुल ते बह
श्रवृत्तियो के श्रध प्रयोगो की संखा
रहा त्रडिग, चेतनरप्त्न छा नैतिक वल करा!
सच है, सरधरा यह उक अथक यल सै
युग युग के प्रो से जीवन मुक्त ह्ये पुनः
मानव गौर बहन कर रही, भिर सुकृट वन,
कीर्ठिस्तैमसी उड उतके तप्तम चागकी।
स्वर्दूत
वह देखो, नव जीवन सा संचार ह रह्य
जन यामं म आज, दजन कमो मेरतजो।
नद वसंत मे खम गंजस्ति कृनो से हस
दिश् कुष्ठभित जन कास उठ रहे, शी छख कूजित /
नव श्राशा आता से मुखरित जन मन श्रव
नव्य चेतना पे दीपित, श्रवस, उजल्लतित
हृष्ट पृष्ट तन शत कर पद् थमदान कर रहे
भेव जीविन निर्माण हेषु, जन मंयल प्रसि,
स्र्दूती
चराः, एर निर्मम तं्तारो से पीडित यहभू/
कत्ण दस्य देसी वह कुरित मानवता का,
युग युग के शापो विशार चे कवलित जन
दैन्य दुम कै प्रजर् से लयते जीवन-मृत //
मिष्ट के सब्ह्यं षेद मे एजित दे
रग रहे है रद हन. जीविनः कर्दम मे।
सीत ताप श्रपी पनी से वननकुसुमों से
त्तण भर तिलकर, इुग्ह्लाकर, श्रादिम निर्य की
निदयताः कों श्रपिति, मिष्ठुर नियति पराजित!
-स्व्दूत -
प्र॒ दंसो, मस्थल में ' हरवि दीप चे
धरि घोये. याम .जग रहौ जीवनं चेतन,
३१
नव॒ शोमा ते लिपे पुते जन संस्थानों ते--
सौम्य शील संरा के उर निकुज ये
लोक चेतना स्पशो, यलो से श्रनु्राणितत ।
संप ककिच्धित य्य हो रहय मानव जवनं
रुचि स्वभाव वैचित्य मधित मू के भागो मे
णक मात्र सत्ताके अक्यव से यै श्रगणित,
मधुचको से गुंजित्ति जन जीवन वैभव से!
धन्य च्रहितक भूमि, तत्य पर प्राण अतिषठित,
मानकीय साधन से गुलम जहां जन मंगल !
विश्व शाति कामी ये जनगण, मूके प्रेमी
सरल संयमित जीवन जिनका श्रम प्र तिरर ।
गृह धंधा उद्योगो से, त्कृश्रो चरखों ते
बुनते संत आत दुष्ट जन-जीवन प्टजो।
लोकृ जागरण के इनके साचिक यल ये
रजत किरीट वनेगे निश्चय मानवता के--
रक्तं सक्त विर शाति करति के श्रयदूत बन !
श्रतिष्विनित इनके भू मंगल के गीतों से
पृरय धरा के आम नगर, कानन, नद् निर्मर !
[ विश्व शाति द्योतक वाद्य संगीत ]
मंगर गान
ग्रो, जन मंगल है!
शस्य हरिति रहे सतत
स्वर्णिम भर च्र॑व्ल है!
शति रहे नील गगन,
श्यति सिध वारिं गहनः,
शाति दूत यं दिशि क्तण,
विश्व शाति शत्दल हे!
सौवण
छजन क्म तिरत जयत
प्रणा द्वेप स्वरथ क्रिरत,
शीति चधित हृद्य म्रणत,
पूजितो धरम फलद!
भौरि रहित दह्ये जन मन
पेम सित जग जीवन,
शोमा अपलक लोचन,
कुसुमित रिद् मंज्ल है ८
शति द्ये समर अरमादः,
श्रांत मनुज का विषाद,
शांत निखिल तकरवाद्,
साति सग भ्रुत्ल है,
स्वर्दूत
चलो, चले श्रीद्योगिक वेन्द्रो मे गी तण भर,
धनी वकतिर्गा जहौ उयलकी धूम निरेतर
धूल कर मान्य भावी ॐ करे क्तिनि कौ /
जह उमड़ते शिश्वक्राति कै मलय बलाहक
मह्ययुद की लये एर श्त धार वरसने,
तथा शाति क्रे भू उर जी कूर श्रगिकी!
स्वरदूती
वह देखी, कच विश्रुत दे के श्रधिनायके
विश्व शाति के लिए षह्य समवेत हुए है,
चिन्तापर संख, कुंचित भू, रेखक्धिति मस्तक /
सौच रहे मन ह मन, देव, विस्व मे संमति
सावि मरि चरथो रे स्वाति हे स्तौ.
क्तु व्यर्थं सव! विधि की जाने क्यार्पीह्ति है!
द
कुष मी निसंय नही कर् सकरा शाति मिलन यह,
जसा होता आया सदा हया वैता ही!
रक्त वित्डव्रादों मे सव समय सखो यया,
स्वाथ त्याय करने करो कौन यहः है उत?
आज गभीर समस्या है भू जन के सम्मुख
युद्धनही तो क्या वै तत्र शांतिके लि?
स्वर्दूत
प्रर देखो वह विश्व शाति की रजत शिखा
जोतककर्तय है--हताश वह नही तमिद मी!
मध्यमाय क्रा पथिक, तटस्य सदा हिसा से,
पृत्र्ाल का पोपक, सहजीवनं क्रा धोपक,
त्रणाद्धेप से विमृख, प्रमुख युग द्रा मीजौ,
चिन्तन इश तन, निज महदाका्ता सा उन्नत,
चुप न रहेया वह, जुश्या धर्म चर ले,
जन मंगल का, लोकन्यायकरा प्त ब्रहूण कर,
निज नैतिकि वल डाल सत्य क्री त्रिय के लिए!
सवर्दूतो
सच कहते ` दिगप्रात ` जगत कादीप स्तम वह,
उसके उप्र वरद हस्त है लीक पुरुप का!
त्राह, घोर शिक्यं मेँ च्राज वेदा मू जिनः
धरणः देप स्पर्धा के दारुण दुगं संगरित,
हि प्रचारे ॐ कीणर चत्र भर रहै
उ्रमर्त, कटु तकौ वराद मे ग्ध्नमन कर ।
रंग व्रदलते रह-रह छवतसरवादी गिरगिटः
रटते च्र्धं पित दादुर् च्पना ` अपना मत,
उल प्रित जीवन कदम मे, कंठ एलाकर ।
अशो के मुजय लोटः, एुषकारें ममर
जनमन क्रो करते तिपाक्तं एन खोल मयंक ः
्ध वासना के षधे, केच, सरीठप
रग रहे निश्वतन तम में धरा-नसक के!
सींग.
[ऋता
साद्ण
स्ट, राति, कराच; चंपा शनेको
प॑त॒ चुदप्टाते त्रीति हर उलूकस
गहन प्रैपेरी खोह्ये मे केठे अन-मन करी!
भूख-भूस चिल्लाते कते जिन पनर
प्याप् प्यार, स्मर दगध, स्नधु्रो के तृण पजर,
मह्य म जीविन तम क भर दे र्य
पुय के स्तर एर प्दत्तिजीी मानव गिर
स्व्ूत
श्र, मन मे अव्रसाद दविर रहय तम-कएटसा
युग मानक शंप नियतिं का दस्य दयक
वह देखो, कैपकेप उस्ता धनि मृ दिगेत
त्रित धातो से / किटि प्रयग हो रह
प्रखी फर जीविन नाशक परमा शक्तिके
सेनार्रो श्च वयुल षीप दन ण्डता ठुमफे £
वोह पौ से हिल-हिल उता अस्ते धरातल,
प्रतिध्वनित हले हयी मृद्यु की चाप र्थि मे
भीषण रण यानो से मधित "उदर ययन का,
उगल र्ट संह्यर श्रभि वमन क कटु षि,
मृद्यु धूल उड़ रही परा मे िधुव् सक्रिय /
मह्यप्रलय छ दाच्ण दकायाः मंड्यती
ॐधियाली के श्रवती मे लद धरा पर्,
श्िश्वयुद् ऋ क्ट क्षोपणा फटने फरो अव
वित्फोटक सी, छशा दानव के' हके
चली, लौट हम चले सुरी शीद्धाया मे रिरि,
देखे, कौई महत् कम द्ये जन्म ते र्ह्य
मानवत्ता के स्तण हित देव लोक मे!
[ नवीन जागरण सूचक वाद्यं क्ंगीत |
शहा, मनस्तयो पर चद कर. हम देषो की
तपोयेमि मे पेच यये रि सश्र रारिमिय /
३५५
स्वदूती
पी फट चुक्री ! पुनहला पण वग कीद्धमाक
मोहित करता चित्त, स्पहली ककारो करी
स्वर-संयति मे सृकत्स वेतनातप सा गुंषिति!
मौन लालिमा लोके रक्त शतदल सा प्रहित
खोल रहा दल पर दल, निविल दिगंत पह्ठमित
उ्यलित प्रवालो कै पर्वत ते खड़े हिम शिखर !
रक परीत तित नील कमल जय सनन वंत प्र
सतित पलक सोल रहै निज अधं निमीलित !
जाग रहे पलो के वक्तोजौं प्र सये
गेम मृग्ध वद मधुकर, उन्मन रंजन भर!
पारिजात मंदार लत लगी विहरे
सृग्धाश्रो सी हरि चंदन तस्ओों ते लिप्टी--
विलने लगे अशोक प्दाधातो की स्मृति से,
देवदारु के शिखर द्ये उठे, लौ, खरप्रम /
गिस्च्य देवों के संग रहता स्वर्गं निरंतर
तपोभूमि को सृजन भूमि में वदल च्रलोभ्रिकि।
सुनो, जागरण गीते गा रहै वैतालिक सुर,
कमर्लो की अंजलि भर, जौ प्रतिमान टि के!
[ प्रभात वादित्र संगौत तथा सहगान |
रेक्त केमल, श्वेत कमल
सुले ज्योति पलक नवल ।
रक्त कमल जिन स्मित,
श्वेत कमल याति जनित,
सखोल रहे रश्मि कुसि
मानस मे ज्वाल्ला दल!
नील कमल श्रद्धा नतः
सण कमल क्ति प्रणतः,
कदम मँ चिल्ले सततः
प्रीति मधुर अंतस्तल!
सौवण
५५.
(4
सृजन प्राण व्ह, निसिल शछतमव सभव उत्को 1
सुना, ध्यान सेपुनौ, स्वरगतं मापण करता बह
श्रध-स्वरो म्रा व्यथित; स्वमो. तै पीडति ।
[ भविन मूचफ़ वाद्धित्र समात् |
कति द्रष्टा
व्यक्ति समाज, समाज व्यक्ति, ~सौ परिडवना ।
साध्व प्रथम् या साधन.--सा तकं वृत्त है!
च्रनेकृता मे एक, एकता मे श्रनेकता,
बहर मीत राब्द जाल सव, केवल वागृचल ।
याध्िक्र वौदिक त्च, रिक्त दन के चोपकः
भ्रति इद्धि करी प्रेत समस्या मानव छत;
जा श्ररण्य रोदन करती युय कै मानस मे;
निजेन सेच्हर मे भिर्वा सीरा सौख ककर!
सत्य एक ह-व्यक्ति समाज, श्रनेक एक, जद
चतन, वाहर भीतर सव जिस पर चषलंवित ८
वतेनं यति से व्रिरोध जय के च्लुप्राणित,
व्व संचरण जीवन काः वपम संवुलित।
स्वदूत
मानस मंथन चलता युय मानव के भीतर!
करा दरेष्टा ध
देख रह्यर्म, वरफः वन गया, वरफ़ वन गया]
वरफ वन गया पथ्राकर, जमकर, युय युग,
मानवे का चततन्य-शिखर-नीरव, एकाकी,
निष्किय, नीरस, जीवन-ूत ~ सव वरफ़ वन गया (/
राख मात्र जड, सीतल, ताप श्रव्या नही कक;
ठंट,. बुमे हम अंगार मे प्राणो ऋ
ताप नह, मन क्य जीवत अकश नरह अव ,
१ का
साचण
[
सावं
च्रानो परः चद्रने सोयी रातिव की,
जमे प्ल पर फलक शवान शवैत रक्त फे)
श्रा मरते जो निखरं सीत कष्टक
महय्य कंकाल ॐ शेय परतन /
चमक-वमकर चिल्ला उता यं प्रकष्श शी
सतर्यो दामानौ क्री नकावौध मृ,
प्रतिध्वनित ह्यं मनशिलाओं पर चिर निदत्त /'
म्बरूती
श्रातम व्ित्क दैन चकि योय दर्यन ॐ
क्रति दरष्टा
राग पिति, निाण शम्य का मूते सूय यह,
तिराते निस्वेए, याति क्र स्वेप सासा,
जीवन अत्यास्यानो के ऋण श्रयि सौध सा,
मति नेति का, श्राल निपेधो का दुगैम गहू!
सख गये रणा घोत बाहर भीतर कै
शीतल, हिम शीतल जीविन की जड़ समाधि यह!
स्प्द शुन्य भख रविता महाशरून्य की
पेरे सकफो मह्रवु ॐ वहत् पल सी,
रिक्त ज्योति वन्याय; अल गया जन धरणीका
सूप रय'रस स्पर्शं सुलखर जीविन उपर मन,--
प्राण के सोरम पसो मे सर्म गुंबस्ति॥
म्बदूत
मध्य युगो के जड़ तिपेध, जीवनि वर्जन नै
किति कर दी मुक प्रमति मारव वरिकास की/
ऋत द्रष्टा
विर शिखर पर जाती जिन स्वर्णिम शिर,
मह क्री पनी प्त निर्जले कवाश्री सी.
३५९
॥ 91
हती व्ह न अरणो शी मर्मर हलिली
लोट स्पहली लहे मँ धरती की रज एर
प्रणय गीति याती न मधुकरी, मधु श्रध से
मुकृलो का सुख चम, मुम गुजि एलो मे,
कके न पाती क्री मजि उलो पर उद्र
सृजन प्रेरणा शृन्य, श्रमृ्तं व्रदेह लेकर मे॥
स्वरदूती
वि श्रार च्रविदा में संतुलन खो गया!
[ भावोदौपक वादित्र मंमीत ]
क्रत द्रष्टा
श्राह, इस अर्णो का स्पंदित ताप चाहिर्,
जीने को जनमन का भावोच्छरात चह,
हरिति-प्राण उल्लास से रहित इत युग-युग के
पतो के निर्जन, कर्ण, कराल दढ कौ
गंध गुंजरिति, रतत कृटुमित मधुमा चाहि९!
गला सके जो इतके भस्माठृत ठषार कर,
मिटा सके मौीपण रिराय, मारी विषाद करो,
अलोक्धित कर तके पोर नैरास्य पिमिर को,
जके है जो शृते श्वेत कंकाल हस्य से/
हाय, खौ गया शत्र तमत्त मे धरा शिखर उठ,
हाय, सो गया शून्य च्रतद्रा मे जामत् मन,
भटके गये वीह मरुपथ में चरण बुदिं के,
देशक्राल से प्र, नास्ति मे, मन के लोचन
स्वप्हीन तंद्रा मे केय सुल गये निनिमिप,-
ध्यानावस्यित, स्थिर, निष्कंप, अरूप प्रताडिति
श्रत्म नग्न नर, स्कति देह मन के केमव से,
अम्ल धौत पट ता, - धुल गये ग्रहति के सवर्टय(
[ निर्जन विषादयूर्णं वाद्वित्र संगीत ]
सौवणं
सौवण
स्वर्दूत
वौदिक मस्मे लुप्त हे गया उत्त भाव क्रा!
क्रत द्रष्टा
ङ्त इद्र क स्यर्थिम प्ट में लिषटाको
रूम गंध रमसे मंकत भूयण पह्नाश्रो, "`
ङ्से घुले द्वा ठै, भावप्मो से मुंचित
जनमृ के विष्टरत परथपर चलना पिखलात्र/
उसे उध्वं नम के प्रकाश को ्रात्पतात् कर
जन भू जीविन मे मरित करना वत्लाश्रो/
जिते किरि च्ल तके अचल, स्वर्णिम घ्ीतोमे
भर् कर करवहसफे वयसे, नव यति पाकर्,
शोभा में ह्ये दरषित मूके शरणो की जडिमा,
लोट लिपट भू-रज मे हो नवे माव प्रहित!
1 जीवनोन्लाम सूचक्र वादित्र संगोत ]
सूती
महत् समन्वय आज चाहिए युय मानष करो
देव मनुज प्रु जिते ह्यो अंतः संयोजित /
क्रांति द्रष्टा
देख रहय गँ सटा षरा चेतना शवर एर
युग प्रमाते नव जन्मलेरह्य र्ड्वि क्षितिज मृ,
स्ख-यमर धर ररस्मि-मुकुट भू-स्वयं माल पर
युगयुय से स्तंभित, निर्दड, ्ालस्थ, स्वार्थरत
मानव के च्रष्यातसं ज्य के ज्यौतिमुगक्र
दरषिति ह्ये रहय तियं का रतस्य सनातन
विरह मृद् जो रहय ग्क्त षरा ने द्येकरः
जीवन स.उपर उट मन कै च्रे गुल पर!"
४१
शर्
फूट रहे य॒त रोल विदन प्राणो मँ मुरारि
धरती कौ तिन प्रीति सवित वह्नि गँ गे!
शात हो रहे मानव के भरभिद्धाप युरो के,
पूनः मरि रटे विटं जड चेतन, जिन मन,
मानवक श्रासा मं नवर प्राणो से सपदित ।
शफ ब््वि-जन-जीविनि निश्व्य--वसुधरा ही
मनुज सत्य ऋ अमर मूर्ति, जीवित मरतीकि है
प्रमित चराचरमयि यौ, शाश्यत जीवनमपि ञं! ।
एक छोर चैतन्य भिरंतन, रश्मि पंस सित,
भावों त्रा सतय प्रफर करसि अङिति,
ग्य दृतय छोर, श्रकृल श्रतल जदरतमहै,
धारण करता जौ शपते श्रविकार यर्म मँ
जन्म मरण, भप जीविन क्रम, सुंसदुस के स्प॑द्न ।
देख रहा म, मूक घर कै प्रतल ग्म
अग्नि स्तंभ उठ रहण त हेमा शैल सा,
महा श्रागमन का मूचक्र यह व्योति पसक्तण /
| युगानर सूचक मधुर भीपण वादित्र रंगीत ]
सव्रदूत
निश्चय, यह मानव भविष्य द्रए्ठानव युय कति,
भूत॒ भक्प्वित् के पिनो प्र वाधि रहा जो
स्पेप्न पग ध्गरनिते माप चेतु, शत इद्र धदुप स्मितः
गरज रहय नीचे उद्रेलित जन युगसरागर!
[ तीव्रतर वादित्र गौत ]
स्वर्दती
यह देख, वह कंका रथ पर चद् कर आता
नेत्र युय कः मानव, प्रदी जीवन पवेत सा,
घरा पंक कौ दग्ध, सनोनम को दौप्ति क्र!
१ क
सवण
ऋका
सिण
[ दुर सपि हूमादमे उस्मेरारम्र)
एक देष
फन श्या न्ह षट भर्फि सदर. भैरो ऋ
श्प्नी दुर्धर प्दकणो चै दपि करता;
मदेन सा, जन ननं मे रप मर्मर रेथभर
भ् च्मुद्र क हिष्तोलित, भय भेदिते करा!
क्प चह महा प्रलय, ति प्रमेतन ह्यनाय रे
जन परी फे रने छाया भद्रि कार
दोड रहे उनय्त एवन, एषो ममो भूषन,
निश्पय, यह नर कलपतर, यद् ग्य सयाथर
नया सजन ना कहा मर्ये फे सम त्थ
सनि पर्प यह, श्राया पय यष्ट. पोर पृ गहै.
॥ 8;
॥ 8.
कुछ देव
श्राच्रोहे, शाश्रौ, शच्रमिदादन, रात शछरमिवाद्ने /
स्वरदूत
शात हयो या क्रुद्ध वेय स्वागत नत होते,
[ स्थचक्रों के आगमन कारव]
देवी
कोन, कौन त॒म तत्त स्वरणं से दास्ण चंदर,
धरा यभ॑कै गुह्य तमत्त से कट सूर्यस?
मर्तो के तुरगो पर वट्, मर्मर हर् हर् भरः
जन मन को करते अआंदौलित, पिष उच्छरुमित?
जीविन कदन मे वज उठता नया यानं अव,
मन की मूरा मे जग पड़ती नयी चेतना,
ग्रासो के तवचेतन तम मेँ धंसी ज्योति मेव,
चव्य स्ायुश्रो के दपिन मे रजत शातित्री।
शून्य निराशामे च्राशा, संशाय मेँ त्रास्धा
अविनय मे श्रद्धा, सम्मान उपेत्ता पट मे,
संपा मे जय, सकल्पं च्हता मेँ चव
क्विपा प्रलय मे सृजन, पोर तममेंव्रकशनव।
हाय, कौन तम विद्रोह जन के ईशर से
उलट प्रलट कर दिया निचित जीवन कम तमने ।
¢
सौवणं
[ आत्मं विर्वास भरा सौम्य स्वर ]
महं व्रह सौवण, लोक जीविन का उतिमिषि/
नवे मानत्र मै, नव जीवन गरिमा मे मंडित,
युय समानत का पत्र, विला जो धरा पंक म,
जट चेतन जिततमे सजीव सौदर्यं संवित
सौवर्ण
सौवर्ण
शरथम् एक, अविभक्त सत्य मै, एरिर जड़ चेतन!
मैद्धी मृतं प्रकरा, युच्म श्रौ स्थूल जयते के
स्तर्या क्ायातप मेँ किकतित । मत्यं चमर मै,
जिसके च्रेतर मे भपय कै शत स्वणिम वग
नव जीवन की शोमा मे स्रागर-से सपद,
विश्व चेतना से मेर हह अनुग्राशित !
मेँह्श्दा का मिष्य, जो व्यक्त जगत कै
काल यित, खड्ति सानो के भूत मकिष्यत्
वतमान करौ अतिकिम छर्, उन्म प्रविष्ट टे,
विक्रततितं करता क्रय जग करो नव सीमाश्रो मे
मै ही वह निरेत्त, विशि सप्तमे जे
चछभिव्यक्त हो, जग जीवन मन कै मृत्यो मे--
उनके संक्रमो मे, "उदय, विक्रा, दापि मै,
उनके मौत स्थित, निरपेत्त वना रहता मित /
प्या व्रार्वयं कि वुण्े कल्यनाश्द् लगता /
स्व्दूती
कला टि यह "` महत् कल्पना जन भविष्य की (
सौवर्णं
उपर भमै रवभा त्रा कंय दैवे मे,
सजन चैतना के प्रतीके जौ सृ शछरयोचर,
नीच मानव जये मूर्तिते, श्रिय ज सुगको,
दषं को कर ऋत्मसात् षिकषित लेता जे /
त॒म दीपक से भित्र समते दीप शिखा करो?
विस्मय करते शते ओं दृषनो में
जीव्रित रहती है व्ह? म वृफानोहीमें
जलने वाली त्रसर ज्योति दं “मैं रहस्य हैं 1
मयुर मिही के पर्षि हीमे प्लता हैँ
मा कै पंोपषर चट् जपन ज्वाला सा
सैयर्चेय करिता मे चवर, सायर, कानन मे
ध्
चद
मूत्त भ्प्यत् वतमान मुमे ही सित्,
विश्व समन्वय से. मै महत् समष्टि पररा,
जन प्रेर्रा मृतिमिन जीविन स्यंदन म!
स्वर्दूती
लोक काव्य यह, जितम सृ मूर्तं द्यं उठता ८
सौचणं
ध्यान मौन ठम, रुन्य श्र्ताद्धिय नम मे खेय,
मे खोजते जीवन सै निष्किय निरीह ल्य
र्हा नही भै“ अत्विदो ते दूर, निरेतर
जय जीबन हीमे निषि, अति चे च्रतितिम ह ।
आल ज्योति श्री" भूत तमत चे चष, उमय ही
स्क तमान यमे है, -वयोनि-तमत से ष्गै
खयं त्य है (---स्योति-तमसमय, जह-चेतनमव,
म॒न जीबनमय, ठुकमे जो वागर्थ ते जहे
स्वरदूती
देव काव्य यहे, जितम तव निहित हव्या नित!
सौवर्ण
श्यो प्रकारा के प्रागल ममी, दग्ध पसल
शियु-यलम, कये ज्वा पकार, दवे प्राते?
क्या गर करता जो होती नह्य मातरम्?
क्गिरो मे हने को सत एल न ह्यत,
उन्हे चृमने करौ न चलती चल लहर
प्र् ताति वेणी न कष्य ह्येत हेसेतिमा?
ह्येता तक्षकाय शृच्य, जलता जीविन मह
ह्येता रका पकारः इ छर न दहेत
म ग्र कार परकश, मै अपकर ऋ
चपर हे {-, चो जन भू जविचमय ह, `
` सौर्णं
मैरे लिए प्र्ररा-तम है, मै ही जीति
साकम ह चत्त ॐ तिष्व कोरे #/
ल्य शात रत समुद्र, श्रगरृत्ल कचरे
जीवने स्त्य चमरः" जट चैतन उफादान भर
प्रो द्धर् के वी, मै सवुक्त समी तै,
का कल्पित किह वुन्ह्यार वहिनं श्रश्रुमय?
चिर साध्वी जन ग्रति, विरहि ह्ये चकती वह ?--
मित नव नवर स्प मे जो छआलिगित मुभे ।
तुमको श्र एर विश्रात नह? नित नप्र
पत्यो में त्रित ह्येता जग जीविन करममे!
तरम केवल षित् सक्त्य श्रिये जतै है
जो च्रकर्म श्रौ" श्रतकमे वन गये युगो से\/
सबरदूती
अमर काव्यं यह परपरा करो करता षिकधित)
सौवर्णं
अर् हरिति जीवन पादप मे)“मूल पत्य मै;
सृष्दर स्थ सेयम, संकल्पय महत् यात
मानस विकतित सुमन, सूर्म स्मित भाष रंय दत,
परमि चेतना, सृत िक्नात, सधु प्रेम मर्म पन्,"
श्राराऽकत्तिाः के मधुपा से शात रुचित
नेष युय मेँ मै जन मानवता का प्रतीक है
अ्योति भीति, आनंद मपुरिमामे न रपरिति।
मेव सरति का तारवि, च आाप्यालिदना म.
नवे विकरित इदि, मन भरर से श्रतिचेतन ८
त्ख ल्प मे ग्लौ त्रम प्राते जो ममक,
ये भृति देसे मुछ चव जने जीविनं मेः
युय युग के खीवन क्रा परति मुलय उदा शव
नप शोमा लपटो गे, "जायन् जन रगृह ज!
मायी चैतन्य, मूर्तं क्त्यन गात्र नें
४
म धन मानवः -"पवे श्रेष्ट, चन श्रेयस्कर जी
उसे वधन श्राया मू जीवन प्रचल मे,
शोप, दुख, अन्याय, दन्य कामृमि मारहर!
श॒तियों के पते मे मने श्या गँ
चव मधु की गुंजरिति मधुरिमा यातत प्र्ठवित ।
सप्त वतना मुव्रनों के श्रय गमवर कौ
लक चेतना मेँ करने श्राया हं मूर्ित।
एक धरा जीवन म जन के मन प्रोके
सचि स्वभाव वचिव्यों कर नव संयोजित,
युग युग के मानव सचय क्रा तमीक्रण कर्
नव॒ मानव्तामे करने आया ह वितति ।
स्वप्न गवाक्तो से दौषिति श्रव मुक्त काल क्षर,
धरा कत्त मे देश संड द्ये रहे समवित,
युग युग से विच्छिव चेतना के मकारा फो
मँ जीवन सूत्रो मे करने श्राया गिति!
स्वरदूत
छ्रजर काय्य यह, इतमे जन मातरी ऋंतर्हित।
सौवण
आज धरा जीवन चछर॑चल मे वेधी प्रेरणा,
च्राज जनो के साथ ्राणप्रद् दजन शक्ति नव,
श्रवन कला के घ्न निकुजो मे पल सक्ते,
प्रयरित वत्तौ मे चव स्प॑ंदित नयी चेतना
नेव जीवन सोदयं उग रहय जन धरणी मे,
मनुप्यल की पसल उयलती हेंतती मृ रजः
नत्र मूल्यो की सरसम मेजर ते मूषित!
[संज्ञा रमे प्रस्थान : नव व्ंतागम का वादित्र संगीत]
स्वदती
विस्मय-स्तेभित से लगते निष्प्रभ हे तुरग,
नत्रोन्मेप उद्धेलित, गोपन समापय रत /
सौपणं
एक देवे
धर गर्म से ग्रकट, धरा मेतमा गया, त्रो,
वह तेजीमय स्वरणं ॒पृ्प रिरि, श॒तन सु्ोज्यल,
` स्रशिम पापक से दीष करदो का मने /
मौवणं
वरत रहे शत निः तिर अषिमानतत से
उज्जवल तप्त हिरसय द्रविति, नव युग प्रमातमे-
उतर. दही ह्ये सर्यया ऋआलोक कारि सिमित
खण बरे पै मुखरित सुर वालाक्र के--
यवन शोमा मे उक्र कने उनमू को,
देवी
चलो, चले हम धा स्य मे, जन मानव वरन,
छोट ्रिदिव की मानस राति श्रिय मोय भूमि को
श्रयति विसुख जो, दिर निष्किय, वंचित विकात से /
म्यं लेक ही शिस्त्य भी का नंदन क्न ८
[ देवो का अवतरण सुचक वादित्र संगीत |
स्पर्दूती
सण प्ट सुल रहा लोक जीवनक भू षर,
जन मनिवता अरास् प्रेरा से हिल्लो।लत।
नपर जन अरामो, नव जन नयरी मे हृख सदपि
मष युग श्र्णोदय हंता नव श्रा दीति!
स्वर्णं घंियौ सी वज उठती रजत श्चविल
उग्ध त्तितिजि तायनं लयते सम मंजर,
स्ये दूत सा उतर रहा मत्र युग मरमात चव
शप्र लालिमा मरा र्मिफे के निग्र सा,
श्वेत कयीतों से अवर पथ मे श्रभिनंरित.
हरथ सुर खय मिथुन जय रहे ज्योति सीह मे,
रल मर्गसिति से लयते तस्श्रो के परह्लव!“
४९
द्रधित हो उठी शून्य नीलिमा अपक नभ की
देस धरा मुय, शत रत्च्छयाप्रो मे कष
निधिल विश पनिद डद सा प्राण तरित,
श्रगशित स्वर लय द्ंगतियो मे जिन मुरारि ।
स्वरदूत
दैन्य दुभ मिद गये, दँ गये पूनिल पव॑त
ध्रा देप स्प्था ॐ भय संशय प्न कै,
जन रोपण, श्रन्याय, श्रनय से युक्त धराष
एकदत शव शांति, साम्य, स्वात्यं अरतिटिति !
शप्र शाति, जो सर्वं श्रेष्ठ यति मनिषिमनकी,
जितै स्वरिम पलो मेँ जन मू का जीवन
सृजन हर्षं से स्प॑दित, स्तरण श्र) शोभा मँ
करिविर कता बाधा पेन हीन, क्छि मे
नव युग उ्तव मना रहै उष्ठपिते धरा जनं
ग्रीति सूत्र में यँ, मेजरतितन मन लोचन;
नव वसेत म नेव जीवनि मधु संचर कटने ८
समवेत गीते
युग प्रभात नव, युय वसंत नेय,
जन भू का च्रभिनंट्न गाये!
करिति हृदयो के मृदु स्प्दन
क्रितनों के मधु ह्यास, तधरूक्ण
क्व से मधु सुमनां मे संचित,
मारो इनके हार वनार्ये!
्राकुल उच्छरातो कौ सोरम,
उत्सुक श्रपलक नयनो के नम
इन नीरव सुकुल से सूत,
स्मृतयो की माला पहना्ये!
सौवणं
[ऋ
समानश
युग युग की दह मौन प्रता
ममौ अंजरिति जीवन दत्ता
प्षफल ऋज्, जन मू में चर्जित,
ङं सेह सें हृदय लगाये ।
यै ग्रत जन द्ृद्य विलन के;
जने पूजन, जनं व्राराघन फे,
भवि युगो के इनमें विकमित,
टन फूलों को शरीर चटा /
५४
स्वप्न भौर सत्य
( आ करीर सास्तिविकतो कै वोच युग सरथ
पयते काण्ये स्पे 7
कलाक
दोमित्र
छापा चेतनां
प्रथम ट्य
[संध्याका समय : एक तरुण कलाकार का रेग कश कलाकार
दौवारपर गी काटी तष्ती धर रंगीन खटियो मे पतक्नर का रेपरा-चिव्र
वना रहा हँ ओर वीच-वीच मे, चिकी से वद्र कौ ओर देता हुभा,
मेद स्वर मे गुनगुना रहा हं 1 ]
[ गीत ]
मर्मर मरी वनाली ^
नेन गात, हिम मगन पात,
सूनी जीविन तर डली /
छ्यु भौत करंदन भर कातर
जीविन का संचय पडता मर,
मटक रही उद्प्रात्त गप
मू च्छा सी मतवाली /
मधुङे रंग चित्रि से कंदर
रारो का यह ऋतु पजर
तमी भितेरे ने र दी निज
स्म तूलिः रय प्याली/
धूप कहि सै भर मृदु चवयत्र
हिम से निखिर र्य क्तत व,
कलि कित्लय से टश्य पटीर
श्नेभा सजे निराली!
मघ पतमर का मिलन सुह्यया
विर्व प्रति स्वो कीं माया,
पीत शिद्धिर चछरषरे पर चयी
रि नव पल्लवे लाली /
सीवणं ७
५८
ग्र भरती हय कलियां
मृ मधुप करते रगररलिर्या
स्ति पात्र मे श्ितिने मोहक
माणिक मदि दाली
[ वाटर देपता हआ ]
कलाकार
परतभर श्राया, जग जीविन मेँ पतर श्राया,
मर र पडता युग ठय फा सुराया वमव,
मन की ठठरी बाहर श्रचिल निकल श्रायी टं
मावो, तक-विचारों क नाद्यौ उमर कर
दरी, यु टहनियो स चिरतं पड़ती है!
श्राण प्रमंजन समुच्छ्रित पकार चछोडता,
तिहर तिहर उठता श्रादोलित जन मन कानन:
ग्रलय॒ गीत गा रही च परसलियोः जगत की,
जीर्णं मान्यता पीले पत्तो सी उड़ कर
धृलिसाव् हये रही मौन मर्मर कदन भर!
गिर भिर प्ति नए अष्ट सुख नीद श्ररक्तित,
स्मर हिमानी जडी हृदय की डाल स्पहली
विघ्रर विसर पडती निर्जन म अश्रुपात कर!
[ भिन्नो का प्रवेश |
पट्खा मित
नमस्कार ! "फिर वही ग्रति की छवि का चित्रण?
व्ेषन्यटै
कलाकार
कटी दछोड सक्ते है वच्चे!
मका च्रंचत्त ?
सोवणं
पहला मिन्र
मौका ्ंचल ! ठीके, अमी
यौगिक शि हयी ह्ये! ( हस्य)
निर्निमेष, मादक ग्रमीसे
मात्र प्रयती का प्रि सुव रेखा करते क्ल.
मुग्ध यद्तेतते, जिन रे कर्तव्य विमुव द्ये (
हत ्रमाद के लिए कमी तुम जन समाज से
राप्ते होमे
दुसरा मित्र
(चित्रको देवकर) कैसा मधुर सजीव दस्य है।
परतर के सूरे फ्जर मे नव वसंत का
हृदय ह उग ह्ये सरित, भव भावं उच्छृ्तित/
टेम मेदी र्वात्नोः की रगप्टी से
नवर शोगा का ्तितिज सोक्ता मर्मर कित !
छायातिप कैक उता परु कलि ससं से
मुष्टी भर रेखाच्रो मे विसतोन्य त्िजन की
आशाऽका्ता गूँज उठी ही, स्य ध्वनित हो,
नव भावो सै श्रांदोलित शश देह लता सी
सरथ वनेश्री भूम रही मध वाहु एश मे...
रेवां ज्यो लय की वहती परए है ।
कला रेरा शल त्रलि के संचालन सै
मर्तं दे उ्टी है अवाक् मा मे च्रपलक ।
माभिकि कति है!
कलाकार
(मुग्य भावस्च ) मात प्रकति कती शरद्य है (--
प्रत्य प्रतत् कै, प्रणा प्रेम कै, हात ऋ््रुके
छायृततप से गुंकित है जिततका करुणाचल' ८
अन्म भरण रौ" प्रलय छजन कित्के श्रनि मे
रासि भिनी सेला करते हे निभि गार ८
भष्
कीन राति पह? चल निघ के दटिजाल शने
नित्त दिका उद्ाल सत्र दयाम मेः
प्रन स्याति व्ह? जिह्नेगयकणाोफरोरय ङ
द्दरधनुप वेणी दृह्य दी मह्यशृन्य मे;
विष्िति ह! मेव सजन स्प्रमधि कन चेतना
माकि रही पल्लधित स्रेयो ते विरो कै?
त्वन मै रहिते हद्धी के पजर क्रीदं
पट रही जो श्रेय म॑मिमा सं व्छते की
फलाका के विद्, चय ही, विश्व ग्रसति वह
निधधिल परेणा केयं जननी है रहस्यमय!
पहुल मित्र
श्रमी शति के च्य स्प परमोहितहो ठम;
मुग्ध यौवना सी जो निलय वदलती रहती!
चज्जा की लालिमा कपोतो पर रग प्रतिप्ल
श््जाल र्वी बह नित हावो भावों के ८“.
व॒ मगो उत्तकी कंपित चछरचलत दाया मे,
उते श्रकूल अतल श्यामल जल विस्व मानकर
प्रलको ते हता कमल पृष्वव से पद्ततल,
नव समनो से नाग्नि वैणी रह नषे!
शि किरणो मे पसे सुनहले श्रोत कणो को
शर्य पहनाते ह्यं क्हिपिति उर को!
हदय रक्ते से अंशि कर चष्टे सोमा को
द्धि श्ण तनी मेँ र्ये कहि इतेः
तुम्हे ज्ञात हैर श्राज उति ष विजय प्राप्तकर
मनु का चृत निमृण कर रहय मयी सम्यत!
मनव मे केद्धित छर शी सपमा निस्य की
उ मनुज शो पौष दिया जीवी शक्ति मे,
दूसस मित्र
मतिम यथातुग्हे ! म्ये मातु ्यतिख्
श्राप रहेद्यं ठम हिर परः एप वचन चृ.
ॐ,
1
पहला भित्र
तके इद्धि से प्ररिवावित चेतन युय मारव
फाप पुण्य ते मात नर्य
दूसरा मिव
क्यो तकर बुद्धिभ्नी
व्यथ इहष्ट देते ह्ये !"'इस युग का सान
मात्र ग्रति का दात, इदियो का प्रजक्र है/
वह निर्य कौ स्थूल शक्तियो करो अर्जित कर
श्पनी श्रेत श्ात्मा प्र अधिकार खो चुक्रा,
वाह्नं विजय क चकाचौध ते च्रत्म पराजित
वह क्िनारा कै च्रंध गतं की श्रीर् वदृ रहय!
षरि प्रापि हे दूर,-उके शात निग के
नियमो का प्राललन करना है गुद इद्धि पे,
इसमे हयी कल्याण निहित है मनृज जाति क,
नियमं पर चलनः उन पर त्रिजया ह्ेना हे /
पहला मित्र
वीत कभी का चुक्रा प्राङ्तिक दरयति क्रा युग
कम तेते की तरह लयाये ह्ये रट जिकर
श्राज प्रति नियमों ते नही, मुज ह्मि सै
संचालिति ही रह्म नियति मनव समाज की
स्थापित सार्य नियम वनते जाते पिधान के,
शद्ध भर नर नित्य च्रंस्यं निर्दह अनौ का
शोषण करत जिन चरशंस नियमो के तप्र
नियमो प्र चलना श्रा एरानित येना 1"
कृलाश्मरः को नैतिकता सिख्लाते हो ठम?
युप नियम् एालेया क्या वृह चतम शुदि के,
विना लीक चलने ह्ली मे च्छक योर है?
६२
काकार
नही जायता त्कवद्, द्रन् नही हः
मेने सीखा नही पहेली कमी बुग्धना।
पर जौ मन क श्रो को पंदर लयतारै
उपे कतै श्रौं नुगा ? जो शर॑व के
घटवासी कौ प्रिय लगता है, कसे निर्मम
तिरस्कार कर उते गला? यह मनुष्य सै
समव ह क्या? हीः" वद्र निर्दया है यह!
म॑क्या कर? विवशां, सुमते नद्य सकेगा
मन तो मर हाथ नही है, त्क वुद्धि त
न चल सरग, मुके भावना हयी पिव हं!
जो, श्ननजाने ह् मन क़ोमौहितकर लेतारै,
चितवन क। श्रनिमेष लूट लेता निज बुरे,
स्प रशमियो मे उलो पलक्रों का विस्मय,
जो प्राणों को पागल कर वरव्त मार्गो ॐ
स्वमपाशा में वाध, हदय तन्मय कर वेताः
मै उ्त्को ष्टी चर्यः निज संग वलि ते,
व्ह चाहे ऊक भीद्ये, म यह नही जानता!
पहला मित्र
क्या प्रलाप करते हयो पायल प्रेमी कास्ता (
मानव जगत कटा हुंदर् है प्रति जगत से,
क्योकि अधिक विकसित हे वह पुष प्शुश्रोसे।
ऊध्व रौद पद् दलित कर चुक्रं जड़ निसर्ग को,
शीश सुकाएगयी वह पनः प्रति के सम्मुख 2
जिते पङ्ति प्रस मान हर्षं सें हिलाती
शरीर प्रणत रेगा करती र्प्े के नीचे!
पलो की रंगीन शिरात्रो ते रहस्यमय
ज्नानवाहिनी सूद नाद्धिया है मनुष्य की/
मानव जग मेँ, जनगण जीवन में प्रवद्य कर
नयी प्रेरणा वुम्हं मिलेयी कला के लिए,
१ ऋका}
सवण
+
4
८ पद व 4 स्ना व्ल नच
मानव के मन करो गढ्ना स्वोच्च कला है ,
जन, से चहज सहावृभूि हयी मनुज हदयं श्न
सार्थकता हे, व्ह प्रेम क क्षमता माहं /
प्रश्रो, देखो छव सोल कर मनुज जगत को--
कता हहाक्रर छा रहय श्राज क्य है;
दसरा मित्र
श्रसि मद र सोचो, देखो मानव मन कौ
कसा हाह्यक्रार का रहय त्न वह्यौ हे
पहला मित्र
शोषित ककल कौ सूखी चीक्रारे से
कप रही है चन वास्तव्किता जगती ऋ!
दूसरा भित्र
भौतकिता सै इदि अंत, जीविन व्प्णा से
पराभूत ह्ये, भूल गया नर आल न्नान फो ८
पहा मित्र
एक शरीर प्राघ्ाद सडे है सखर्गं॑षिचंषित,
चारो छरीर च्तंस्य विनोनी भाद त करी
वानी पियो है, परा्रो के विरो सी
घोर विपसता छाय हे मानव जीविन मे!
दूसरा मित्र
एक शरीर श्राय प्ट हयो रहा मनुज मन
चारो ओर विरा श्रीर् चवचेतन क तम,
भाव परधिर्यो दुलमाने मे कुठित भू-जन
श्र सज्लकते जाते है वा्तना पंक मे
पोर श्रराज्कता है प्रणो के कवन में
६४
पहन मित्र
श्राय पुनः संगिन ह रहे शोषित पडत,
युग युग कै पनर् संहर उ्ठ परा गर्भ ते
काति दती दावानल स्री, भूमि कष सी,
महत् वर्मं विस्फोट ह्लं रहय मानव जगम ।
दूसरा मिव
श्राज पूनः संगठित द्यं रहा मामव का मन,
नेव प्रकाश ने दौीष्िति श्र॑तर्चैतन गहर
नव्य चेतना से मधु कर्त सृक्म शिरा
नपात श्रव निकट महत् मानव माती ज्र /।
पट्न्या भित्र
लोक साम्य की व्रहद् मावना ते प्रेति लहै
सामृहिक निर्माण हे श्रव उुक भू जन /
दूसरा मित्र
विद विदि मानवता के भावों से प्रेरित
श्राध्यालिक उन्नयन हेतु श्राठुर मानव मन /
[ वाद विवाद मूचक ध्वनि संगीत प्रभाव ]
कलाकार
उव गया मन घोर विरोधाभास को सुन,
कलात कल्पना; द्ाडइ स्मातर् तर्थ्या के संग ८
[ अंगडाईन्छता ह]
च्रञऽह् /
[ वाहूरसे नारे ठमाने की आवाज ]
(नारे) कऋतिक्रीजयलले प्रजातैत्र कीजयल्ले.ज
लोकतंत्र की जयहे! जनमंयल क्री जवल
सौवर्णं
पटला मित्र
मुनौ, वधु. वह जन समुद्र गर्जन भरता है,
अरतिष्वनिति हयो रहै मोन वन पवेत कंदर,
जाय रहै निर निद्धितभू कै निःसर गहर,
लोकोत्सवर यह, महद् प्रदर्यन लोक पर्वं का?
[ दूमरं मिसे]
उयो भिप्र, व्योह्यर मनाती जन मानवता,
चलो, सम्मिलित ह्ये हम मी प्रार्ने प्व मेः
कलाकार की प्लके इव रहय निद्रा म,
उसो सोने दौ शछपने क्ल्ना नाट मे
स्वप्नो की परियो के संग. मावना मग्न हो,
दूसरा मित्र
चलता है प्र, लोकत पवं मे नजा सकूगा! .
ह्न नारो ते कही तत्र सकार कमा सै
मैरे अंतर मे उठती ह ।...निजैन मे जा
सोन करैया सहन मर्म जिन्नाता की श्रव !
[ दोनो मिपो का प्रस्थान ]
(नारे) नये राष्ट्रकी जयहे! लोकतेव कीज्यहो/
काकार
शिथिल पड़ गयी दह, व्ययित हयै उट श्ण मन
नीरत त्को के वोभिल शब्दाड्र से,
इनसे कह प्रेणप्रद लगते ये नारे...
राण शुक्ति का स्प॑द्न कंपन जिनमे जन करा!
[ भाव मग्न होकर ]
एक श्रौर चेतना शक्ति है, जौ मानव के
छतिरतम में चत्त है, स्यति प्रीरिमियः
मौवणं
६५
६६
जौ पिका पथ मे संभवतः, जिप्के धूमिल
चरण चह भू प्रथ एर दोष गये हु जन!
त्क वुद्धि, मतवरादो से जो कही प्ररं ह!
उत्तकी आभा कमी स्फुत्ति ह्य अंतनम में
प्रालोकिति कर देती स्तः निचित भेदौ को!
सममयी वह, सृजनमयी, श्रानंदमयी व्ह,
कर्णा कोमल, मा की ममता सी मंगलमय,
ग्रीति मधुर्मि से भर श्द्ा मौन हृदय कौ
दीपित ऋर दंती रह्स्य सरव सहन वोध ते
सौ सौ मावो क दल सोल दगो के चम्युव!
[ अंगडाई नेकर् ]
श्राह! ने जाने किनि फूलों की मदिर गष फ़,
अलति नृ लेती मयर चयो मे
लात ही उठा मनयो विश्राम क्या,
स्वमा की परियों के दायाचल मे दिपकर।
[ तच्त पर सो जाता ह ]
सौवण
स्वप्न द्र्य
एक
[ मेदे मधुर वादित संगीत : कलाकार का मावाक्राति मन स्वप्नावस्थाने
अंतर्गम् के सूध्म प्रसारो मे विचरण करता है, जिते स्वगं कते है ]
[ स्वं चेतना का गीत ]
, सायत, चमरी मे च्या!
जीविन स्मो ते विभीति हे
तंद्रा मे मत त्रिलमा्ओो /
जागो, जायो, दिव्य पथ हे,
त्यागो भत्र भय, मुक्तकरंतिहे,
सर्गं शिर यह शत्र शात है,
निमय, निंथय, चरण वद्ात्रो /
यह अंतर करा सृदम संगठन,
मन करता प्रया शछ्ररोहण,
ठम जड़ नही, श्रनस्ष्ः चेतन;
चेतो, सन की मीति मयान्र!
मह्यनेद की उठती लहरी,
पुण्य य्ह के चतथ ग्रही,
जन्म मरण की निद्रा गहरी
छोटो, नर जीवन पल पराशरो ।
प्िणिकर द्रति वन जो दुम श्राये
तन मन ग्रीं दे कुम्ह्लाये,
तौ वरदान दहे यदि मये
भू पर् देव-करिमिवि ले जाच्रो।
{ संगीत कौ बकरे मन्द पड जती]
६८
केंककिार्
[ आंखें मरता हया ]
की स्वरतंयति है इस संदर देश में
स्वगं लीक है यह क्या, दछ॑तर्मन का दषणं?
जर्ह्य मान संगीत प्रकाहित दह्येता रहता
सूच मावना तच्रप्तरियं के प्द्तेप से !
निर्य, यह मानव जग का प्रतिमान रूप है--
किगते युगो का भाव विभव है जित्तमे संचि!
ये सी कयां विचर रही चत्रन॑त मे
दिव्य चेतना सी, खप्नों के पलो पर,
ये कैसे व्रच्छित हई जवन पदो ते!
त्तमा है ये क्या जो तन में रवधूने करौ
मडरातीं उड़ चिद् नम में निन्शब्द उर्थं सी?
च्रथवा ये चिर रहत शक्तियो; मुज नियति कौ
संचालित कती जो दिप कर स्वर्तौ सी?
इन्दं कौन परिचालित करता ?--गृद परध है
संभव, ये अतर प्रकाश की लाय हः
धरती की रज बाह्म च्रवरण मर है जिनकी।
जीवने का बहुमुखी सत्य है एक, ऋसंडित
अधः उध्वं सोपान ध्रेणियौ मे वहु बह
एक दूसरे पर निभर हे जिनकी सत्ताः
पकागी तमिव्यक्ति नही परेयर इनकी!
मनुज चेतना मटक गयी क्यो मध्य युं
मावलोक्र मँ ? ऊर्ध्व पंथ क्यं पका उतने
सवभ लोक मे शून्य युक्ति का श्रतुमव करन?
मुक्ति रिक्त कल्या नही, गस्तविक सत्य है!
उते प्रतिति करना होया जन समाज में
महत् कास्तेविशता मे परिणत कर जीवन कौ!
सूच्म सर्गं को मी किर विद्तित टना होया
जन धरणी प्र उतर, मूर्तं श्रवयव्र धारण कर,
वह यथार्थता मे वधन कोच्का हा ह
सौवर्ण
=, ^
सावण
[ याद्विय संगत केः साय गंभीर मधुरं प्रार्थना गान ]
ह क्ता उन्मुक्त प्रार्थना यान वह रहा,
भिर श्रा व्रिधाम्न दले उठे त्रर्मुसिति,
य॒ष्य श्रथ मत्र फेसतः करि होउ मे
उद्भाति द्यं उठे तङ्ठक्करिं से दीति,
यहु श्रि भ्रात्माश्रो का करुणोज्यल प्रकरा हैः
वरदल्स्त की छाया कानि क्रि ये भरू प्रः?
कव्व महापुट्पो से लगते ये पवी क!
स्व देखता हँ मै क्या? या प्रति जायन् हं
समू, धरा फे स्व्िके प्रगिनिधि क्या कहते हः
[ छायां को मेवोधन कर ]
श्रभिवाद्न करता है, श्रद्धानत मस्तक मै
जनम फे सप्र ते पड्िति,-रंग वलि से
रयता जो निति परा चेतना के त्तेत एद्तलः,
उर श्म करस्णा ममता, सोना तुपमा ते भर,
लोक कला का महदा, नर देको सै
महत् प्रेरणा का श्रभिलापी, मर्त्यं जीव मै!
प्रथम छया
मर्त जीव ही नही, च्रमरताऽकत्ती मी ठम!
हम मी जनम के परमिमायक; जन सेवक है.
प्यात्म सक्ति प्रथ त्याग, लोक जीविन वैदी प्र
हमने पार्धिव स्वाथौ का वलिदान क्रिया निज!
श्वं मी हम सर्परशील है स्व्यं लोक में
मू जीविन के प्रेय के लिए्-त्रत्म तेज से
मारा अक्ाशचित इर जन यण का श्रुवे तारकव्त्
कलाकार
मेरा मी मृ पथ प्रकररित करे क्प कर!
६९
प्रथम छया
स्रफल मनोरथ ह्ये त॒म वत्स, कला जीवम कौ
मृतं रास्तविकता वन सके, उप्ते जन जीवन
निति नव सार्थकता दे, वह जीवन व्ष्णाक्र
मानव्र॒ च्रंतर क प्रकाश मँ सूफतिर कर
उत्ते मनुज के योग्य वनय प्रणा देप को
ग्रीति द्रवितकर मानव इश्र करप्रपिरिषिटेः
लोकोत्तर जीवन विकात की क्त्र है धरा
मानव्र क जीविन च्रातमोत्रति क्र आण है!
दूसरी छाया
एण्य कमं रत रलये, पाप का पथ मत रेको:
मर खल सजन कौ करते सम ज्योति दाननित।
एक सर्वत प्रेम व्याप्त सव॒ चयक मे,
वही प्रम ईश्वर, जिसका मंदिर मानव उरः
तरम पवित्र यदि रहो वम्हे र ङिसका क्वा भय?
सदाचार प्रेय भरू पर, स्वगं लौशे!
कैसे सिलते एल, उन्हे क्या जीवन चिन्ता?
उनका पलक सम द ही रक्षक हे जगम!
पमा रात्र को करे, दम्हे प्रथ त्तमा करम,
भमः त्तमा, जने द्या, मिनय, सोपान सगके।
धन्य विन्न नितीह, उन्हे सर्षाम मिलेगा
धन्य स्त्य परथ वचार, होय पृणक्षम _ व!
धन्य प्रित हृद्य, ईश्वर का सुय देखेगे
धन्य राति कामी, प्रथु के शिशु कहला्गे।
धन्य न्याय हित व्यित, स्वर्यं मे राव्य ङ्रगे।
तुम धरता के लक्ण, विध भर के प्रद्मशदये
ङेधरोय हिमा कोभ एर क्रो प्रकारित।
तीसरी छाया
शयोक श्रः जरा भ्रु रहित चय जवन,
मुस्क वृष्या-मार, राक्र दृजेय मनुज का!
७
प्रथम् छया
सफल मनोरथ हयो ठम ब्रत, कला जीवन की
मृतं बरास्तव्किता वने स्के, उत जन र्जीवरन
नित नव सार्थकता दे, वह जीवन वृष्णा
मानेव चर॑तः क प्रकारा मं द्पातर कर
उते मनुज के योस्य वनयैः-त्रणा देप को
रीति द्रवितकर। "मानव ईर का प्रतिनिधि है.
लोत्तर जीवन विक्रा की चेत्र है धरा
मानव क्रा जिन च्रतमोनति का प्रगिण ई“
दुसरी छया
पण्य कमं रत रहो, पराप का पथ मत सेको:
ग्र खल सजन कर करते सम यति दानगित।
एक सर्वगत प्रेम व्याप्त तव॒ चराचरे मे,
वही प्रम ईशर, अत्तका मंदिर मानवे उरः
म पवित्र यदिरह्ये ठम्हे किर कितका क्यामेय?
सदार श्रिय मृ प्ट, स्वग लोक से
कते विलते एल, उन्हे क्या जीवन चिन्ता?
उनका फलक सव करा ही रक्षक है जगमे।
षमा रात्र करो क्री, व॒ग्हें प्रर क्ञमा करटो. -
ग्रस, क्तमा, जन द्या, विनय, सोपान स्वगके।
धन्य बिनन्र निरीहः उन्हे स्वरम् मिलेगा,
धन्य सत्य प्रथं चारी, ह्य प्रणङ्राम वै
धन्य प्रवित्र हृदय, ईश्वर का सुख देखंगे
धन्य राति कामी, ग्र के शिशु क्हला्गे।
धन्य न्याय हित व्यधित, स्वर्गं मे राज्यकरगे।
वम धरती के लवण, त्रिध भर क अकाशो
हरय महिमा कौम एर कटो अकाशितत।
तीसरी छाया
रौयरोक ओः जरा गृल्यु पीड़ित जग जीवन,
चस की वृष्णा- मार्, शत्रु दुर्जय मनुज श!
= ९
सात्रण
१
सवणे
राय देप पट् शक्रं ऋ पट् चरे मये,
धकर अन्नान जनित छाया जन मु प्र।
श्ना गुद्धि क छतर्ुख अहि पथ है दर्ग,
तंवोधन का द्वार व्रि खर्थिम जालो चै।
मूल चरति) है, असार जिसकी वरेष्णा का
माम छूपमय पडायतन, मव, जन्म मरण है)
कारण, दभ निदान. निरे समम कर माचव
जन मगल का मायं गहे मध्यमा प्रतिपदा ।
चण मयुर यह जगत, नित्य चैतन्य न श्चास
निचित पदार्थं त्रनित्य, कमं जग-जीवन-्वधन,--
तरष्णा दुल क्रा कारण, उत्करा एर त्या कर
महण करे जनगण सेवा पथ, जीव दया रत।
वुद, धम श्रौ" स्र शरण ति्वाण प्राति पथ। `
चौधी छाया
संर कवल एक, श्रीम दया सागरं जो
उतके सव॒ तेव समान, जातिया व्यर्थं है।
मरत्यु श्रेष्ठतर म्रद्यु-मीत के श्वि से;
हशर एर व्रि्वास, धम का वारत्स ददु ।
विनय, दाने, प्रार्थना कंपदा संत जनो क,
ईरय जन ताम कहता मै पृषयी पर।
पांचवी छाया
1
श्रमालौट कर श्राया ह पाद्व यात्रा से
श्रमी नही मर प्के मर्म के व्रण मी के
जो कचि लोक सेवा के रिय उपहार च्हिरह!
अहपुद्य जौ व्योति चिह जगतीके पथ
छेष गये है मने श्रा्जीवन उनका ही
सप्र श्रनुसरण श्य ८ अतुल छदो की निभि
संचित कर नित, उन्हे कलोदीमे क्स उर कौ,
ॐ१
॥ 0.
मैने विविध प्रयोग श्रिये जन के जीवन मे--
स्वतः सत्य का पालन कर मन कर्म कचन से /
ईश्वर तल न कहके. रहै, सत्र ईर ह ?
सतत श्रत् पर सत् फी, जह तमप प्रकाश्चकी,
तथा प्रत्युपर जीवन की ज्य होती जग मे
नियम वियामक दोनों एक तथा श्रभिन हैँ!
भू जीवन मे श्राज नये के प्रति श्रा्रह है,
समी नया चाहिए मनुज कौ, जादू सेग्यो
सभी परना त्तषणमे नया वद्ले जाप्या!
शाश्वत करीर विर्तन सत्य नही हे कुमी,
चछ्रभिव्यक्ति पाता जौ जीवन व्यापररो मे,
पूनः पुरातन का नूतन मे समावेश कर!
सर्य तले, कहते है, कुच मी नया नही है,
धटवासी को छोड़, नित्य च्रभिनव, पुराण ज।
सख्रादी सृतो के स्राच्तिक ताने वाने भर
जन जीवन पट बुना सरल लोकोज्यल भैम
जनगणके श्रम वल के मूल्यो एर त्रापारिः
हिता शओौपण फे धव्यो से उते वचाकर
श्रीः प्रतत्य के कल्मप से रक्ता कर उत्तकी/
अन्यायो च्रत्याचारो के प्रति व्रश॑ष कै
मैने नप्र-वज्ता के तख्ता अयोग नव,
युद्ध जर्जरित जय करो दिखा श्रहिता का पथ,
मर हदय मेँ मानव गौरव पुनः जगाया,+--
आत्म क्ति से रोक पाश्यिकि हिसा का वल!
करकिार्
अव भी जन मन ममैर् कर उठता सभम सै,
पावन स्मृति के मलय स्पशं से पलकाङल ल्ल,
एक नया चततनाऽ्लोक उट धरया गभं से
वदता नम छी चर्, स्वग उख दीपित करने ।
शात प्रणाम; जन युग की ट्त छआराभ्य ज्योतिक्रे/
सौवणं `
१०५
पांचवीं छाया
जन मंगलो लोक करम रत रहने तिरर
सेवा करना ही अ्णामं करना है मुभको)
[ "स्पुपति राघव राजारामः को धुन धोरे धीर श्री रामचंद्र कृपाल
=
"सवि
भज मन" कै दटश््ण कंठ स्वर मे इव जतौ ह ]
कलाकार
श्रो, यह क्या स्वतः सुखाय तुलसी क स्वर है?
एक स्वर
मँ पहिले ही प्रम मंत्रदे चुक्रा क्श कौ!
राम चरण अरलंव विना परमार्थं सिदिकी
पुरा वारिद की निरत रद पकड कर
नम में उड़ने कौ श्रभिलापा सी मिथ्या है !
त्याराम मय जान समस्त जगत को निरशिवित
यार्-वार करता प्रणाम युग पाणि जोह निज ।
दूसरा स्वर
प्रम लोकप्रिय यह दती ही की वाणी हे /
एक स्वर
मुके लोकप्रिय वतलाते है दसूरदात्त जी /
सूरसूर दै/ जिनके मधुर श्ण्णका शैशव
"छव मौ घुटनों यल चलता इत भरत भूभि के
धर षर मे, शशिन ओशन पर, भुवने मोहिनी
छ्पनी लीला से विमुग्ध कर जन जन कामन ८
च्र्र भी मौन निकृंजो से वेशी ध्यनि क्न कर
ज्यौतस्ना मँ पलित करती रहती भू का मन,
यष्ुना तट नित सुखरस्ति रहता रास लति से!
तम श्रेत्ंखी दि यह! श्राप राम क्रो
#॥ 11
पदा. एण्य रहै दंसते । मुखी उने
धनूर्याणधर स्प र्द्व प्रणम्य रहा.
केटाकार
यह पया मर ? मनि, तरल में प्रमाप ती!
दूसरा स्वर
दत्य निरत, गिरिधर मे लीन, भवतत वी,
गरम द्विानौी मीस केवले तन्मयता. है.-।
निःस्पर नृषुर ध्वनि से ही उत्प्री सत्ता श्र
मर्म मधुर श्रामास स्वर्यं कौ मिलता क्रत ।
। तोसरा स्वर
ठीक बात है, मस्त हुघ्रा मन तव व्यो वले !
एक स्वर
शवद श्रनाहद के करवीर यह, श्रफयप्रेम का
गुह साक, रगुगे-से सदा रहै मुतकाते /
दूसरा स्वर
सूरदेम , पुपुम्ना के तारे से कनी मौनी
विनी चेतना सुर चदरिया स्वच्छं श्रापने,
कुप बिह स्ते मुक्त : धन्यै श्राप, कि जितने
धरवट का प्ट खोल सत्य के सुल को देखा
सद्रय॒रु से चूनर रेरा उयो. की वयोर दी
शममर `रहे साजन को श्रिय शगार आपका
ण ˆ चौथास्वर ।
मुम" च्ाप्की च्रमर साधिर्यो. तदा प्रिय रीः
नमत्ारिणी काव्य दि, मार्मिक, रहस्यमय
'उंलटवावियो का क्या कहना । ` छरदूमुत, : द्युत
मदी नाव के वीच स्मातती रहती प्रतिपल।
[ वादिव्र संगीत : छायाएं अंतर्धान होती है :. मंच स्वर्णष्णि
=
सावण
कलाकार
मेष मद्र क्या ये कवन्धं के मादक सर टै ।
५
चौथा स्वर
श्रमे को है ग्रिय शास्य-लित खणे षरि,
पर भारत के छकर्मण्य जन मुख रतत का
देखा करते त्दा...विगित गौरव सप्नो मे
सोए, निज दायि कै प्रति सोए रहते!
सामाजिक चेतना न शरव मौ जात् उनमें!
नए राष्ट्रका भार वहन करने मँ श्रमः
जाति ्पौतियो, कुल प्ररि मे किमक वे,
रूदि रतियो से सादिति, मत भेद प्रताद्ित /
मेने निज प्र॑तर कौ सखिमि कति तै.
भू भागो की संतियों का क्या समन्वय,
वरिस्ववाद् स्थाति कर संड्िभू ग्रिण म
भारत की शछ्रात्मा को परश्विम के जिन की
नव सौ्व-गरिमा से एर के आभृष्िति कर.
मानव उर के मावे को परहिनाए् मेने
सवण रजत प्रपान रतस्मित कायातप के,
उपा ज्योत्स्ला क्री दाया मे भृ जीवनक
गीती का प्रट इुन श्रभिनव सौन्दर्यं बोध रे८-
श्री खोमा गर्म सते मंड्ति ह्ये जन षरणी,
महत् क्नान विन्नान समनित हये जन जीवन,
यह} मात्र सदेरा विश्व. जन के अति मेरा.
ठम प्रसन्न मन, श्रास्वाधित हो लोटो भू प्र
बह प्रगति. का, श्रात्मोनति करा पुण्य क्ते हे ४
प्रकाशसे भरजातारहं ] ~;
१ 1
७६९
केटाकार
[ अर्थं जाग्रतावस्यामें ]
धन्य भाग्य हे ८ सफल द्ये यया मानव जीवन,
प्राज महापृर्पो का क्षेण सामीप्य मिल स्का,
शरोर महाकषियो का दशन लम हयौ तक्रा /
समी महाकवियो की वाणी जन मंगल की
महत् भवन्न ते प्रेस रह निरंतर /
सभी धेष्ठ धमो का चभिमत एक रहा है,-
ईश्वर पर विश्वास, उत्व श्राचरस् धरा एर ८
समी महापर्प के लक्षण एक रहे है.
ऋत्मत्याय, जन सेवा, दया, विनय, चरिवल /
भू की भिन्न परिस्थितियों कौ मित्र॒ च्य
संयोजित नित किया सर्य की महद् द्या नै,
मूिंमान हयो युग युग मे बहू सदुरपों मे,
तभी लोक पुर्यो की वाणी सत्य पूते ई,
तमी दिव्य द्रा, जनमू के च्रमिमाकक् है!
पर, मानव की नियति ह्यय, सचमुच निम है
सद् क्चनो के लिए वधिर है हृद्य के श्रवण,
मनोमूनि वंध्या है उच्च विश्रे के अति
दिव्य मररणाच्रो के बिमुख सुप्य चेतना !
त्य वीज जन प्रणोके रसस्ते सिचित द्ये
क्यों न प्ररेहित ह्ये उठते जीवन गसिमि म?
करय, कौन सी त्रुटि है? कती परवशता है,
श्रह, प उठता मन मानव की दुरवलता से!
उपर से आकर प्रक्र सन जातात्तम मं
श्रेधकार को प्रीर अषेरा वना धरा पर
दुम्खप्नो ते च्रकुल ह्यो उटक्ता है जंतर.
रौद रहय है कोई उर को" "तिरवासो क
शिखर विसरते जाते, सिततक रही मन की मृ.
व्यो श्र॑तमैन कर विन हले व्ण रहाः-
घने ऊुष्टाते से श्रादरेत हे मानव श्रात्मा ^
सौबणं
2,
[ स्वप्न वाहक वादित्र षगोत : कलाकार कौ आत्मा अनेक
उच्च तथा सदम ्रमाते मे विचरण करती ह ]
रह, क्या सूत श्नेकों स्तर है स्वर्गलोक के ?
कता सम्मोहन है स्यः क्ट वणौ क्र!
यह प्राणो का हरिति सर्ग सा लगता चंदर,
जीवन की कामना जर्ह्ल हिल्लोलित च्हरह
शस्य राशि सी श्यामल, शात वणो मे मुकरलित,
हदरिय प्र॑गो तै यजित, मधु गंधोन्मादन /
मदिरा की सरितां वहती! यौवन उन्मद
श्रप्सरियों की नूपुर ध्वनि मधित करत मनः -
शर्पतिली कलियों सी कोमल देह लर्ण
द्य भंभिमा मर, नयनो को रतीं त्रपलक +
[ भाव परिवर्तन सूचक वादि सगीत |
यह भवो करा स्वर्यं लोकै मनो भृमि प्र,
भूल रहय जो संयम तप कीरा उरी मे
यह व्याप्त दिन्मय अ्रकारा नीरव नीलोज्वल,
सयदि मे वैधी क्यारा, भाव राशि कै
मुकुलं स्प्न-स्मित, पक्व पुण्य फल, आदश करी
लतिका लटकी पातो सै विनयानत हले /
सूतम पायु मंडल में व्यापक्रता है निर्मल
मौन प्रणा की दगंष ते समुच्छुतिति जो /
श्रद्धा ओः विस्वा तरते लं मिथुन-से
उच्चे निचा के म्रशात जल मे रजतौज्वलः,
श्रत्ल नील उर सरसीकोकर अति तरगित।
[ भाव परिवर्तन सूचक वादित्र सगौत |
श्रासशुद्धि ॐ नियमो की निर्जन तमा्पि-से
रौर अनेकों स्वयं वते है, घमं नीति गत
सदाचार ऊ स्तम्मो ए, तक्र ते शिति,
जह्य जगन्मिथ्या की निक्ियता कई हे!
1;
७८
मुक्ति दीप सिमिटिमा रहा पका ब्रश दै,
च॑भ्या क सुटपुट सा पला-तम विकर. करः
प्रासा उड़ती जुय॒द् सी सयं प्रकरित्.।
[ पुनः भाव परिवर्तने सूचक वादि संगीत ] , ,
श्रधोमुखी लघु सर्य, संप्रदायो मे सीमित
लटके हैं श्रगणित त्रिरु से, वहुमत पोपकः `
कट्टरपंथी श्राचासे फे अशुर भन भन
जहा सेते, दारण धमोन्माद वदा कर!
जह रूद्र जर्जर च्रास्था के मंखाङ्ग ष्
क्षुद्र हेता के दिवा है नीद वत्रा
मद प्रभामे, जो प्रकारा ऋ छाया भर है,
्रादशो के उ सर्ग, तंक प्तीण हो,
विखर गए जने क्यो बहु उपशासराश्रो मे,
गुष्क कर्म काडों मे, जद व्रिधि्यो, नियमो मेँ!
[ वादित्र रंगौत के साय दूर से वादित गीतो क स्वर जिनमे
कलाकार को अपने मन के भवो की प्रतिध्वनि मिरती ह ]
सहगान
यह कया मनके रते सपने /
कहौ स्वर्ग सुख शाति, कहा रे
धरती के दुत भरे कलपने /
सपने मी ते क्व के वीति
मीडे सुव क्षण लते तीति, `
धर्म॑ नीति श्रादर्शं सुनहले
कामन आते लयते तपने ।
यह कायां का च्र॑तर्मन
कमी रह्य॒ ओ जीवन चेतन,
छव भी विस्मृत सपु रृवों.के
स्वप्नो ते दग लगते पने ।
सौवणं
एके दत्त रे हु समापन,
सय न रहता कर्मी चिर्तन,
नए जागस्ण का नेव रण अव
नए मंत्र के मनक्रे जपने।
लटन ज सकते वरते ्तण
उन्हेन दो अव व्यर्थ निमेत्रण,
जन मनप्रागणच्राज लगा
च्रशरुत पद चप सै केपने ।
कलाकार
[ चिन्तातुर स्वरमे ]
कह हाय, मँ मटक्र गया ह, किन लोको मे,"
दुमछष्नों से फडिति क्यौ हो उठता श्र॑तर 2
क्यो विभक्तं कर दिया सत्य को मानव उर नेः"
मानव मन की सीमा ही क्या इसका कारण --
संड खड कर करता जौ नित पूणं करौ शरहण/
जीवन, मन, चेतना समी तो एक सत्य है,
स्वगं धरा; जड़ वेतन, एक, चरमेव, एर ठै/
[ नीचे कै वातावरण से उठकर अथकार जनित कटु मंध्ंका
करुस्सित कोलाहल सुनाई पडता ई ]
वै री अकतार उटती श्वचैतन से 2
घोर तिमिरक्ा बादल षैररह्य द्ये भन कौ
करौगिररहयहँ मेये क्या नरक लोक ह?
नीचे उतर दय बुभता जाता बरिपादत्ते,
श्रपक्रार फे भी क्या ह्यय, शनक स्तर?
{दारुण विपादरपृणं वादित्र संमत : प्रवाया मंद पडता द : काकार आने
मता हा करये वदर कर फिर याड निद्या मग्न दता दं! ]
५८
सौर्वेणं ५९
स्वप्न दस्य
{२1
[ कलाकार का दु स्वप्न परस्ते अंतर अवचेतन के छयाधकार पूर्ण शोक मे
भटवता है । सुदुर से वादिते संमौत के स्वर उसके कानों मे टकराते हं ]
८०
[ हासोन्मुख चैतना का गीते |
च्रधकार मी तो प्कश है ।
पलकों मे रे लवण श्रध्रु कण
अधरो पर क्षण मधुर हात है ।
नयनं को भ्रिय नीद पनेरी
जीवन व्ष्णा देती फेरी,
मोह निशा कौ श्र॑चल चाया,
मवुज ध्येय हद्रिय विला है!
वर्था अदु की वधि गेव,
मन की ठत नही मिट प्रह
चार दिव्त क मधुर दनी
रैन गरषेरी शिर उदात्त है ।
ग्कितित पयु ही निद्च्य मानव
कम) देव व्ह, कि व्ह दानव
हास सतते हेता जीवन मे,
कहने की होता विक्रा है !
जो त्ता वह बना रहैया,
वहता प्रानी सदा वहेगा,
वड़े वडे नि हार ग रे
मनुज अकति का करीत दाप्र है!
सौवणं
सीवणं
लिखा करम का नही टलेया
श्रपना वत ङु नही चलेया,
कमी मंद ते कमी तैन है
मन क यति र्वषी संषिहै।
गह्य कौन, शव किपका सहचर
अपने स्व्, सवक्रा है स्वर,
ह्यनि लाम सुख दस की दुनिया
कमी दूर तो कमी प्रत्त है /।
काकार
{ कर्तव्य मूढसा ]
च्रधक्रार ? बह कैते ह्ये सक्ता ग्क्त
श्रंधकार भी क्या गकर [की एकर शक्ति हैः
या ग्रही अंधकार की एक शक्तिह्ली?
स॒.व पहेली है "उफ, मै क्या सोष रहा हैँ /
कैत दूषित वयु हहे ति से भरद /
कर्य त्रा गया मै, ` भित दि विहीन लोके मे।
जरह ह्यास युग का किषण्य तम छाया निचय,
घोर हृदय कार्पण्य भरा च्रनुदार दैयता।
यह कैसी सायो कौ शंषियारी नयरी ₹ै,
जितत रही शषरिररित मेरी कला चेतना ८
क्षुद्र भित्तयो मं किमित है उत्करा भगण
जिनमे विरे षरैदे लगते ठच्च नने ।
उफ, कसे आलतत प्रमाद मे सने लोग ये
कर्म हन्ता ही ह्ये ष्वेव पण जीविने का !
भंड यड मे वटि, युत्त ष्र-निन्दा मे रत,
एक दूरे के अनिष्ट फ हित नित त्सर,
राग देप तै जर्जर, क्वव्थो के कायर
८१
दे
पछहम्मन्य्, च्र्मिमानी, सपरधा-द॑शन-पीहित,-
हठी, कुटिल-मति, भैद्माव से भरे, गिते
परद्रो, प्रतिरोध त्तुधित, निर्बल के पीडकः
कृलह विवाद विनोद, घोर िपमता प्रेमी
निर्मा, निन्त, निरुत्साह, निराश मन
रोय शोक, दाखिथ दैन्य के जीवित पजर
निखिल क्तद्रताश्रो के जीवन-पृत अरतीक-ते।॥
सूख गया प्रेरणा शाक का स्रोत हृदय मे
केवल गत संस्कारो पर जीवति इनके शव,
रेग रहे जो भाग्य मरोते मन रदष्र।
इ्तीलिए ये रक्त स्वाथं के प॑ने फैला
लुटा करते एक दूते का जीविन-धरम,
जाति प्रतिय मेँ वहु संडित, विपटे रहते
प्रथरार ते दरूद्ि रीपिगत भ्यो से!
तद्र संप्रदायो की ससा शच्त्क्रिम कर यै
निर्भित कर पाते न महत् सामाजिक जीवन)
च्छं मोह ममता मेँ दवे, प्र॑परागत
कृटपुतलो से नाच रहे, पि लिपि एर नभर!
[ कषण वादित्र मंमोत ]
ह्यय, कौन जीवन वंदिनी तिसज्रती है बह ?
यह क्या च्रवला छाया सी लिपटी पर्य से!
दिते लता सी कौन चधमरी वह? क्या विषा?
कोन मोशतेयागा करये ?“"क्या श्रनाय शिशु?
अह, कैसी जीवन विमीपिका जन धरण, पर
जौ मानव को वौवित रखती. मयुप्यत्व से
कीन लोग ये? रायद्वेप .क्टु कलह कोध के
मूर्तिमान कुल्तित अर्तीक-ते ? निग्न राक्तियों के
मानुषी प्रतिनिभियो-ते लगते ठै जौ!
सीय .
सीघणं
{ भाव परिवर्तन चोत्तक वादित्र संगीत ] `
यै क्या संति पीठ, कला साहित्य द्वार है?
क्षद्र स्तोमे, कुटिल युटो मे ई््यासंडिति ज
हत युयान च्हेता्रां के मनः स्ंयठन,
प्रपत के स्वाथो, स्घपों से च्रनुमराथिते!
सपे वेधे, प्रच्छवे स्य से, व्यकि जहौ ष्ट
पर-टिमिव हिति ततर रहते, सर्पा पीडति
जीवनं कुंड जह्य च्रशुखल अ्हयत्त वन
विस्मय स्तैभित कर देती त्तण-मूढ च्रतिधि को!
रौर छजन प्रेरणा व्यक्तिगत स्ति निन्दा
निर्म रहती, र्कि शिल्प सौषटव से मंडिति।
य्ह महद निमाण न संभव माव दषकाः
ह्य! संगरित हयार तुलम ठै सहकर्मी पर!
बुद्धि जीव्यं का श्राह्त श्रमिमान प्रदौन
यह मात्र वाणी फी सषा, कलाकारा!
[ भावे द्योतक गंभीर वादित्र संगीत ]
कते मनोविक्नार माध वम गई चेतना
तत्ता से हो किलग, भरंथियोमे हलो गुंभति।
सामाजिक सतन सो यया क्यो जीवन का?
कनि दोषों से ग्रो का संयमन नएटद्धे
मिपि वन फरल यया मनके सैति विधान में?
किस प्रकार खोखला हये गया निचिल भ्रात्वल.
क्यो चसि की अंतः संगति वृथेद्ये यड
युग युग सते संगयित मनोमय शतमान
हाय, सखौ यया मह्यहं के धकार मे
यै साधारण व्यक्ति नही"मन फे निर्गातित
धरणिते विकि कीदाया हे-जीवन राभि
अह, यह दास्य स्वम न जाने कव टृटेगा,
निश्चेतन. के तल रर से उट मेषे त्त,
, किमाकारः ` चकिया ब्याती दत्य सौ
८
कहीं खुला श्राक्रार नही, जो खच्छ वायुर्मे
संसिले स्के मनक्तण भर श्र, घुट कके!
[ मैरा्मपूणं करण वादिग्र संभोत जो धीरे धरे लोकः जागरण फे
उत्सव संगीत मे परिणत होकर दत से दतर होता जाता ई 1 क्छाकार
की पलकों पर् दूसरा स्वप्न चित्र उतरता हँ : सुदूर से वाहित संगौतके
स्वर यते है! 1]
जन गीत
जीवन मेँ किरि नया वहन दे,
एक प्राण, एक कंठ गान ले
यीत छव रही विषाद की निरा,
दीने लगी प्रयाण की दिशा,
गगन चूमता च्रभय निशाने!
हम विमित लये गये विनाशय मे,
हम श्रभिन ह्यो रहे क्कत्त मे
एक प्रेय प्रेय श्रव समाने!
कद्र साथं त्याग, नीद प्ते जगे,
लोक कर्म मेँ महान सव लगे!
रक्त मे उफान लले, उ्ठान हौ!
शोषित कोई क्ही न जन रहै,
पीडन शरन्याय श्रव न मन सहे,
जीवन शिल्पी मथमः, प्रधान दह्ये!
मुक्त व्यक्ति, संगठित समाज हो,
शण ही जन मन किरीट ताज हो;
नव युग का च्व नया विधान हौ!
८४ सवण
{अ
सवण
केकर
श्राज व्यक्ति संघर्षं लोक जागरण वन रहा
धारि र्मम सखाथो कौ शवला तोड़ कर!
क्षित साया व्ल सै युय किन अंधकार एर
विह उड मानस-उज्वल मंयल अमात म॑ /
निश्चय ली वह चऋ्रंधक्रार था नही केला,
श्रलसाया जीविन शकाश या -मान्व मन की
प वधिय, र्द ाटियो मे वेदी ह्ये
म्लान पड़गयाथा जो क्या घ्रा ङुम्हला कर /*"
चेतन ते ज्ड को देखे, जते चैतन कौ
दोनों का नियं एक ही येता निश्चय?
उद्वेत्तित हो उठा आज स्तभित जन सागर
ररौ का नवे जार उमहडता उके उर मे,
मज्जितं क्र देगा वह भू तट, युग प्लवन मे
वाधाश्रो कौ लोपि, बहा च्रव्छाद युगो शा)
नवल गणा के सशो से एलक्षित जन मन,
च्रदोर्तित ल्य उठा विविध शाघाश्रो का जग,
नव॒ वपत की जीवन शोभा में र्गत को
मधु प्लाषित कर देगा बह, नव गोध मैजरिि!
आः, मह्यदू जागरण, युगो से लोक च्रभीस्तित,
भू पलकों षर मृत्य रहा स्प सत्यस्ता,
जगती के वैषम्प्दिरेधो को, कल्मप कौ,
मिटा तदा कौ धरा वत्त क वेर्प्यो करो ८.“
एक अणे रही धरा, युग युग से संडित,"
एक ल्य को वह सह पय पेथि छक्त ले,
जन मू म स्वर संयति मरते पद चष े८
कौन दिशा ब्रह, फिषर वद् रहा जन-मू-जीवन,
मत्त, स्फीत, गर्जित समुद्र त्रा हिल्लोलित हये ?
कीच प्रेररा उते सीचतरी श्रित नवर पथ प्र?
कैसा वह ईस्ित प्रदे 2 जने स्वर्यं लोक व्ह?
क्या उका श्वादर् स्प 2 यह परा चेतना
८५
कत्ता स्वणिम रीड रेगौ जीवन तह पर,
जहाः मनुज की गण कामना परं-काम हो,
पलो के सुस मँ चिपदी कल गानं करेयी
जौ मधुच तमान भद द्ये वगृषु ते
क्या होगे उपकरण लोक सत्ता, संसरति के,
कता श्रंतस्तव !-- जानने को उल्युक मन /
[ षैमव युग का आनंद मंगल सूचक वादिवर संगौतं : काकार की
स्वप्न चेतना व्यापकः जोवन प्रसार मेँ विचरण करती है : बुदूर से वाहित
गीत के स्वर 1 ]
उत्सव गीतं
गीत नृत्य, राय॒ रंय
जन मन मे नव उमंग !
सफ़ल सरणे धरा स्वप्न
लोह नियति दपं भय!
पुणे काम धरणि धाम
शस्य हेतित, शरी ललम्,
शोभित सह छपि प्रकाम
जिन की ती तरय ८
मानवता वर्गं हीन
तच भी हरा रिलीन,
जन सव संत, प्रवास
युक्त विविध लोक स्प
वैमव का रं न पार
छदि विदि सदी द्वार,
आधि व्यापि र्यी हार
र्क्ि देन्य का निपंय (`
८६ सौवणं
चात निखिल ऋव इति श्रथ
वदता जन ऋमिमत रथ,
विस्तृत जनहित युगम भथ
गरि श्रिय जीवन तर्य?
मानव मानवे समान
संति पे रिक्त भारः
स्वप्नो का न्ष किमान
उ्डता उर का बहंग!
कलाकार
जन भू की भावी की ोश्ी यह निम्तंयय
प्रतिम् स्थिति जो भौतिक सामाजिक विकात की ८
मधुर सपन छा लगता जन का किमव स्म व्ह
वर्गृह्ीनि से तत्र हीच द्य जन समाज जव
„ श्राप कर सकेगा परमिसत पार्थिव जीवन का!
वहु शिक्ता संपन, कला कोशल मे दीन्ित
मुज कर सकरेये निर्भय भू जीवन यापन
किकित्, संस्छत, आप्त आरियो-ते एषी ए, -
सामाजिक दाविव स्वतः ह चंचालित कर ज
श्रा, कता जीवन होया तवे जन धरणी का?
उपा सुनहली, व्योत्स्ना श्रषिक स्पहली हयी ?
मानव की चेतना ज्योति अहित सागर त्री
धोएयी भू-की विषण्णता को, जद्रता कौ,
लोक कमं कल्ललित, नव भाग्ेदेलित द्य?
दि. दियत जन मन पैम से च्रप्लापित ह्ये
शाश्वत मधु सते सतत रहेगा यध यंजर्ति 2
श्रीति फुज जन माम श्रमर परियो-ते ऊरुभित
मंडिति कर दगेभ् च्रे श्री पुस यसमा तै?
सौव".
८७
[ प्राणोन्मादन वादित्र संगोत
रूद्विद्धः कुख्ति, कुस्ित संस्कार युगो के
उच्छेदिते ह्ये जामे मानव च्र॑तर ते !?
विस्छत उपरचेतन गहर, व्यापक मनः्तितिज,
विकसित हो जाएया जन जीवन संवेदन?
घररित क्रते मिट वी मनुष्य चरी
दैन्य अति तमत रिरस्त नये प्रकाश्च से?
स्वार्थं ल्लोम कटु सरथा धुल जाएगी भन की?
रूपोतर द्ये जाएगा मानव समाव का ?
व्यक्ति समाज परस्पर घुल मिल जरदैगे तव
भर जाएगा च्र॑तराल दोनों का गहरा?
चिन्ताच्रों से सक्त मनुज आत्मो्नति्मे रत
संति का नव सर्गं वत्ताएगा धरर एर,
च्राध्यासिक सोपानं प्र श्रारौहण कर नव?
[ आनन्द कल्पना मगन वादित्र संगीत सहसा रेण वायो के निनाद
तथा विप्लव के कोलादल में दूब जाता है ]
[ स्वप्न में चौककर |
अह, यह कसी दुर्य॑स रण भेरी षरजती है,
प्रहत कर दिङ् मंडल कौ दारुण गर्जनसै।
कौन शक्तियो" कार्य कर रहीभू मागत मे?
क्यो रष्ट्रोके वीच पडे है लोह-श्रषरणण
कौन साधनो का प्रयोग कर रहे धराजन,
नवर मू स्य बताये क्या रक्ते सने कर?
क्यौ भौपण उपकरण जुट रहै क्वि ध्वं के?
सेनार्प संगस्ति हो रेहीः".िकट, भयैकर
छट शद दन रहे भिगाश्कः वञ्च निनादक्र 2
काल दष्टे जो कराल, जिनके दंशनम
महमा नाश के निर्मम त्य हए दै वदी,
शत प्रलयो का ध्वंस, कटि ृलिशो का पवक
जिनमे पुंजीमूत क्ट सहामारौ के
सौवणं
६८
ष्र्
[ मृ्छु भौर विनागं सूचक करणतम वाद्वच संगोत ]
क्यो मानपे मन का उत्पीहन, जन धरम शप्र
श्राज चल रहय दल व्ल ते, निर्मम साहस ते!
कर्म ग्या रेणु धर्म, मानुफी स्यदापेः
षिकिष संपि-षिवह, चमकीते न मागो के
नियम पत्र, पण, निर्वल रष्ट्रो का एत्तस,
श्रीः तवोपरि शति पोषा देशो की?
नारकीय कमो म रत क्यो उभय शिविर श्रव?"
मनुज हृद्य क्श अराज द्ये यया इतना निर्मम £^
इन तापनं ते होय) क्या छि धेय की?
श्राज साध्यश्रो' साधन में कों इतना च्र॑तर £"
एक्रगी सुख सप्न रहय मानव समाज का,
भौतिक मद् से, जीवन त्प्णा ते प्रमत्त हे,
विखर गथा जो श्रष नाश मे चात्म पराजित!“
युग श्रादशे यथाथ साथ व्ल स्केनम्रू एर।
[ वाद्वितर सेगौन तत्रमे तौब्रनर होता है ` रणनदे ओर
विष्टेव मेक्षोम, चौत्तरं तया कोनादल ]
का हाहाकारः दमृल रख्नाद हे रहा,
शंत शत वज्ञ कटक उठते नम को विदीर्ण कर,
प्रलय कोप से कपि रहै भू के रियत",
नरक द्वार घुल सयान क्या जन मगरूषर
[ भय व्रस्त होने के कारण कलाकार का स्वप्न टूट जाता ह । वह
अध चेतनावस्य मे विस्फारित दृष्टि मे इधर उधर देवता ह॑: सदरूरमे
वाहित मंगौत उसका ध्यान भकपित कग्ता है : वह उटकर ध्यान मौन
अवस्था मे वेट जाता है । ]
सौवण ८५
[ मंद कर्ण वादि संगीत कै साय धस चेतना का गोत ]
श्रंधकार, घन द्रधक्रार ठै,
च्रधकार ह?
र्द मनुज कै हृद्य द्वार,
केन धकार छाया अपार है,
द्रधकार ठै
बाहर जीवन का संर्षण
भीतर च्रविशो का गर्जन,
भरा मौन प्राणो मे कदन
उरमें दुःसह व्यथाभर ह,
वदल रह्म जने भू का जीवन
विखर तो पर रहय विश्व मन,
धुमड रहा उन्मद श्रवचेतन
मयुज विजय वन रही हार ह !
युग परिवर्तन का दुर्वह क्षण
डाल चेतने का श्व्रयन
आरोह करता नेव चेतन
ग्रलय दजन क्रम दुर्ितरार है!
[ वादित्र मंगोत में भाव परिवर्तन ]
हता नव॒ जीवन च्रस्णोद्य
तम मकश मे होता तमय,
तिनु क्षितिज पर दूर सप्न स्मित
उठता.स्वरिम ज्योति चार ह!
यह स्वर्शिकर मावो का शोरित
जीवन सागर लयता लोहित
सत्य मरा स्वप्नो का वोहित
भार युक्त लय रहा ए्ररट!“
[ आथा उत्कामप्रद वादित्र संगीत के साथ यवनिका पतन ]
{-)
सौवणं
दिग्विजय
{ जीने सत्य की वेहिरतेर विलय क्रा काव्यः सध}
मर्तं
अप्सरा
खेचर
नील ध्वनि
दिशचास्वर
मूस्वर्
ऋः)
साचण
[ अंतरिनन मे अप्सराआं का गौत |
गाश्रो, जय याश्रो!
स्वर् का प्रतिनिधि नर
दिणिजयी मानवे पर
नदन वेन के अपन
हेष हंस चरत्राश्रो ।
श्रो रिचुत् वालाक्रीः
भाणो की जालाश्री)
स्वं मत्यै मध्य सवणे
तव॒ नव॒ वनाश्रो }
चेद्रकला पो षर
श्रपसरियो, उड निस्वर
दिय युय का सुरषनु सित
कतन फहराच्रो !
पृथ्वी का ष्टे मारः
उमड़े तचतन्य जार
अथि सनत यौवन मवि,
नूपुर ऋनकश्रो !
रजत-नील युक्त व्योम
निकट शुक्र भोम सोम,
सौभा आनंद म्रीति
लोक मे जयाश्रे !
६३
मादक नर-दैह-ग॑ध
व्यिः ल्य॑-मत्त चथ
मिले धरा-छर्ग, एल
सेज नव सजाश्रो।
सुला अयोति लोक द्वार
प्रतरिक्ते आर पार
मृन्ठुत क्रते ब्रिह्यर,
यवन मव वततात्री
[ सगीत द्नि धीरे-यीरे अंतरिक्षमेख्यटहौ जातौ दह! मस्त भौर
अप्सरा का क्षितिज मे वार्ताटाप । ]
मरुत
धन्य, शृब्द्-गतिं, उयोति-वेय को र्मी श्रतिक्रम कर
श्रि प्रवैय ते दूट, आ द्या कौन भव यह?
वायुवास॒या श्रग्निकाण? या दिशा-यान यह?
था भूतन ब्रह उदि हरा परव अंतरित्त मे ¢.
सोरचक्र की स्र्टिम यतिलय मे वेधक्र जौ
पर्किमा करता पृध्वी क-म, चरि
विश्वे नरत्य मे सत्त-ग्पोतिरिगिण सा चैचल ।
[ परक्षेपस्त्र के उडने की ध्वनि |
कोन मट् खग, इुःप्राहसी प्रमत्त मनुज या
ठीठ पंख मुलसाने-गर्धिति, दि भवने
मेगक्र रहा यप्र शाति निःसीम नील की--
जह अमर मी शरद्वानत, निशब्द विचरते,
त्प्रियं नूपुर उतार तभिसार स्थलों षर
प्रती जात्ती-- संकेतो समाव प्रकट कर् (-"“
नही जानता क्या वहू, प्रहरी सूर्य दिया ऋ ? `
अप्सरा
श्रषटनीय यह.-- कोई त्रमित नील को नापे!
प्रणम वार. धरती के गुरु-जन्रपरा तै उट
४ सौवणं
सौवण
चदरता- अलल च्रलंष्य शंय पर कोर परूचर
याह तिरु की लेता ह्यव, नमक का पुतला !-*
कतं ध्वनि संकेत गज नीह्यर लोक को
तित् तरयो मे केपिति कते (नते ल्य?
[ घ्वनिसंकेत स्पष्ट होते है ]
एक स्वर
कैते हले ठम सेच नै धतीका खरै ८...
खेचर
जी, प्रसत है यगनर्य म ।--बोल रहा रहै
ठीक कार्य कर रहै यान के यं्-यथाविधि--
चक्षत हैँ मे (-दिशापाल अनुकृल दाते -
एकं स्वर
कैसा लगता बह ?
खेचर
ने पक्त ! -- श्रहुत ! श्रद्ुत ।
एक स्वर
दिङ् म्॑ल के कुद श्चवुमव वतला सकते हो?
खेचर
रजत-नील-प्रम स्वप्र लोक मे र्चिर हाहं!
शुभ्र शाति के भाव मीन निश सागर मेँ
द्व "रही निशखफंद चेत्रना- शारल्यन द्ये
उच वाय॒ओं की पवित्रता मेँ श्वगाहिति
मम तन्मय हो रहा -- निदिल का महत् स्यं पा!
भार सुत तन कैर रहा चनद रारि मे
सूर्यात्पिे शत रन्कटाश्नी मेँ कैप एन्द्र
०५
१६.
ताने स्वणेम्रभ व्रितान गोलार्धं नील मे!
हसि कील केदुक सा दीव रहा भूगोलक!
शराः, चरति रोमाच्क, रहस्यमय, महा दिशाका
निर्स्वर नीलम मणि प्रसार यह । ~ जहधरा ॐ
लघ जीन सवर्प लीन ह्ये श्रते मं
प्रथेहान से लयते घन नीरव शनत मँ!
यह च्रगाध, निर्व , श्रकूल उदवि हे ("रती
मात्र वाह्य जल-तल जितत -- ऋग तरित /
एक स्वर
कैसा दीस रहा खगोल ? नक्ते, क्षितिज, मू?
खेचर
वृहत् खगोल ? न पो, परुष पुरातन कोई
देख रहा अविचल, श्रनिमेप, समाधि मगन सा,
सेम रोम मे च्रएने य॒त व्रह्माड प्ररोहित,
ध्यानावस्थित सा, श्संय निःसीम शाति मे
सर्ण-हसति चेतना दि क सजो हृदय मे
प्राततः मणि च्चामा सी लिष्टी जो अनेते,
एक स्वर
आः, रीमाचक्र याया, निय, चतिस्ति की!
शृन्य, विदात्मा मृतं -- अत्म साक्ञाकाररत।
खेचर
कृष्ण्-नील मुख पर स्मित रवास्ण रेखा सा
चिचा प्रक्रश-क्तित्जि, मू कौ स्र्णिम-कंची सा,
भ्रमायृत्त हो छअगयणित कायार सै द्रिरचित
मुक्त प्रसार, -- न किचित् मी वरोध. सामने,
मात्र दिही करी सीमा-जौ सखो खो जती।
सौवणं
+
3
नील-प्ास्य पर मह्य हास्य भर उनज्यल तरे
जगमग श्रते चिद् द्पि-ते नम करतल मे।--
रवखचिते रश्रच्लि लिष्टार् स्फीत देह प्ट
गभेवती वटी द्ये रिशा श्रन॑त कन्त मे--
श्री, याधार ती, शत यवनो कौ जननी!
च्रधिरवीज ह्ये लिप् यन्य या निज ष्म
र्थि योनि को उव करने न्व तोर से!
एक स्वर
ल्य ह्यो जाय न मेर दिष् प्रमत्तह/
खेचर
ममे नह इसका भय ! -- देख रहा परती कौ
इद्रनुप म॑ तिपटी-- मृगय चरनत यौवना
नाच रही जौ मुक उशी सौ श्रतीम मे!
देख रहे श्रपलक ज्योति यह यौवन शोमा!
उड़ता यध प्रपित दुकूल रेशमी पवने का--
रसय हस्ति चोली वक्त ॐ शिखे ए
मूल रही एनोर्भिल नदिय कंव्टार सा--
लहराता तहा सायर का रन मशि जडा
धूप काहि मय रस्मद्रषित रंगों ते रुक्त,
माच रही वह गिरि श्रयो के हाथ उराप्
नील उक्तिमें(-- चित् ग्रकश से तयः वेटि
ठेव रहा हँ--भ् के वहु देशे, राष्ट्र क
पार कर रहा महाद्वीप मै पलक मारते--
स्मरण श्रा रही वहु विशेषता दंशो क
जन मभू के वैचित्यं भरे चंद्र जिन की
यादच्रा रही सुहदो की, स्वननों की श्र्क्तिण
स्मरण कर रहै हेग वे मी निश्चय सुग्को।
सोच रहे होगे मेर च्रदूयुत साहस की
वत्ते मी कटी विश्व सान चरर में
लटकने जङं--मदटक ने जाज-लौद नपर!
चितिति द्यैगे-महत् न्य क्रा एकाफीपन
निगल न जाए कही, अकेला पाकर युकको.--
मनृज जाति से, गृह, सदेश सै जो अव विरहिते ।
हैते होगे शतरु-मोम के पछ लया कर
सूरज से मिलने के मैरे इःताहत परः--
कहते होगे-ह्याथ वहम कर क्या वना नर्
पकड चद्रको लाट्या, करतल मे षर कर?
प्र, मै मानव श्रत की आाऽकर्ता श
केवल म्रथम प्रतीक मात्र ह-जो च्रनादि ते
शब्दहीन शत मह्मनील के चिर रहस्य कर
चीर, ज्योति सखर-लिपि मे अंकित, रद्योच्चात्ति,
उसके वीजात्तर मंन को प्दूने के हिति
चिर आङुल शा-उके च्योतिर्मय श्रौशन का
श्रम्यायत वनने को उत्सुक (-जयी च्राज नर ।
दिग् दुंदुभि षोपिति करती सानव की जय कौ,
वज वज उठती तारे क्री स्पहली पए्रयले-
पुष्पहयर ले स्वायत्त करती सुगध षरा
रशमि पल, शत मुरधवु छायाच्रों मेँ लिषटी 1"
दिशा हस्तयत श्राज साहसी धया पत्र के /
दूर इं रिग् यत वाधा विव मयति कौ"
भू जीवन संयोजन की, मानवे विकास की /
एक स्वर्
धन्यं जयी नर्, धन्य जयी जीवने मू जन का
ग्वेचर
लो, म पृथ्वी ऋ प्रर्करिमा प्रण कर चका--
धूम समांतर क्लितिज वत्त $, दिंशा-वान मे
छव परती प्र उतर, माच्र भू की पद्रज करो
चम, नमन कर्, अंतरित्त के रजत-हप को
सौणं
[ हटात् निर्वा नि सीम मे गहन गम्भीर ध्वनि उघ्ती ह।]
सौवणं
मौके चरणो पर श्रत कर, जन जन मेम
सम स्वाति सर टू, योपन अमुभव कह--
यह रहा उद्ाकू दते (--अनिवचनीय, श्राह
निःशब्द नील, निवा नील, निःतीम नीत (--
नीखुध्वनि
ठहयै दिग्चर उहये- ध्र की परिक्रमा कर
सौल नील का वातायन, तुम य्व सीत टये
छोट रहे छथ दिग् विजयी वन्कर परी ए/
गृ्टठा अच्छोद्य ले जाकर मानवेन्द्र घन /
सनो ।--नील, निःशब्द नील,--मैं बोल रहा ह,
मरा ही गुण शब्द्-मीन उमे तन्मयजौ
कमी मुखर हयी उठता वैश्व-नियम से चरपने (--
क्या पराटगी मुज जाति श्त समदिग् जयते ?--
माना, मंगल, चद, शुक मे धरापत्र नै
व्रिजय वेजयेती फट ली (तो शने क्या?
तोट सकेया मागत ची लाह नियति का?--
प्त रही जो उत्ते कूर निर्मम पाटोमे
देह श्र मन मे वेदौ कर दिव्याला का
मेद इदि से शोषण कर दृदयत्न ज्योति कः
ज ष्दयु पंजो मे निर्जर को द्वोच कर,
श्रेपूति से च्र॑भा कर परलोक चु कर /
[ मम्भीर ध्वनि प्रभाव |
युन र दिग्चर, मह्यनील का उद्वोभन सुन ८
तू मेरा संदशत्राह वन मूजन कै हित,
अमत्र ले जा मेरा-म मंह्य््ल दे]
छम कलत पर ज्य पाना ह धरापृत्र को।1--
म उत्को ललकार रद्य ह -सड्य प्रतीत्नामे
९९
मै, स्वयं पराजित दने मानवे ॐ
ह्यथौ सै-मेरे ऊर्ध्वं शिखर पर चद बह निर्भय
पाया चरपनी सार्थकता शाति, ज्योति,
छ्यानंद, प्रीति, सोदर्य त्नस्वरः-पृत-तच ।
जा, त्रौ भूरर, तू मेरा संपि निर्त्रण ते जा
मैँररकेहित भी उचत ह--मानव चुन तै /
मै प्रसत ह तैर निष्फल दुः्ताहत सै,
बुदि-कुराल खौवले यल प्रे (--श्रतरिति के
मीति श्रगरिति अतरत है-चाकाश्यौ फे
भीतर श्रमिताक्रार सूम, अति गुह्य, श्रगोचर,--
महाशना का गृ विधान दिशरा-प्ागस पर!
कातल जयी वन (-च्रात्मजयी ही विश्वजयी मी
विना मेर पर चदे, माच शाखामृगा सात्र
रह से ग्रह पर दद, क्तितिजते फँद क्तिपिजिपर
वयर्थं करेगा क्या? वाहर के जग मे सोया,
नन्तरं की च्काचौध मेऽरिक्तं परिधि जो
तर ही सव काकेन्द्र,- केन्र वद्माड-- विर्व का--
तेरे ही भीतर सूरज, शशि, मरह, उपग्रह सव।
च्रत्मवान्, तू धराधाम कौ बदल स्वर्गं मेँ!
वाधि विविध मृदेश कफो चव मानवता मे-
शरान व्रिधी शिष्य मे जौ रवद इष्हं,
मू-मनेकातममतलेजा त्र चन्यं रह मे--
गि देष, कट् घ्रसा कलह, निन्दा, प्रतिं /
नत्तत्रो की शुश्न शाति क्री युद्ध कोत्र के
नारकीय कोलाहल मे मत वरदल व्यर्थं दही,
खेचर
{ ससंश्नम ]
गुल, एुरातन-तम स्वर भिरं से चुन पडता है,
=
माचण
[1
1
नीलध्वनि
छषिना्यी हं मे (--किर कको जयत् च्छरमे
पीना, गव हटि तेजो कर (विश्व तकर
लोज्नप्रलय तू मले बुला लेः-वमको शिर पे
काल शिखर जय करना हीया--शछ्रात्म उन्नयन कर,
जन-मू परर मवुज-हदय का स्य व्या कर,
दिक् प्रमत्त, विज्ञान शकि से वहिर्जगत की
रचना कर तू, श्रा न्नान चे श्र॑तज॑य कौ,--
ग्रेम-खर्गं रव मनुज हृदय मे ।-देहं प्राण मन
ह्यं शताय, श्रानंद सोत मे चवगाहन क ।
हतरिय जीवन कृलुमितल्लेनर् प्र रोमा मेः
छतः रस चछ्रमिविक्त, वाह्य वधन सै विरहित!
एकया भौतिक किकात ते उन्मद् भू-जन
मन्यु रद्र का सहं /-सत्य का सुख पहचाने /*“
परथरा गयी विपिध स्वाथ मे मनुज चेतना
गत॒ मूल्यो, धमो, संछपिथो मे शत खंडित,
जाति पति, वणो देशो मे नग्न-रिमाजिति !
महत् संड जव तक्र जन मनका ग्कपि वमनसै
नष्ट न ह्योगा-जन्मन ले एाएया नृतन--
हृदय-सर्ग रचना समब ह्येयी न मर्त्य॑ हित?
हं-हंकार रह्म निस्वेतन ग्रकति श्यं मे-
ग्ज उठा, लो, च्रवर-दरूर रहीं रात धृत् ८
[ परध गर्जन तथा वख निपात का घीर रव ]
खेचर
सट, परातनः रभहीन व्रंतर-जनि उटती {
संकर क्ण, दिक् संकट क्त यहं (की हहं
चिनगी सा, श्र. वै रहय मन श्रत पराजित ८
मात्र यंतरेत् कार्यं कर रहे मन, तन, श्रवयव (
लगता है लड्ख्डा उटेग प्य मूका!
दिगा स्वर
मामैःमामैःरमैहैँ माता दरा, काल की
च्पने तनय उर मे धारण कतीह गै
मूतिमती प्रतिक्धाया उतकी (-उतयै सेचर,
उतत, मेद वाह पट कर, उत्स भू पर!
नयी दिशा दौ मै मानव मन, भू-जन को 1“
दिगभियान ह्यं सफल तुम्हारा, तुम मानव कौ
महाक्रल का नीलकैठ सद्य दे सको!
रुद्र छरीर शिव एक साथ जो, कारर् के कारण,
निश्चेतन शछतिचितन कै स्वामी, कैव्त ।
४ खेचर
मात्र प्रकृति का अश्वान यह (निर्भये मै,
तुम्हे समप्िति कर मा, श्रपना तन मन जीवने!
[ सोत्काम ]
रिखलाई पडता स्वदेशा तटःतयः जोत
सेतो फे रज की सौरभ यह [--उतर गया, लो,
ममल ती दवती पैरो के नीचे भिद्टी--
स्नेह शिनि सौधी सुगंध नतषट मे मर
पुलकित करती तन.--छंवर कौ घनं नीरवता
वचित है इस ह्ृद्विय दीपिनं मादन सुख ते!
स्तितिज वृत्त चवे सीमिति ह्येकर नेव वेत के
स्मित पल्लव श्रधरो से भर्मर स्वायत्त करता--
नील मौन की चेतावनी नही मूला मन!
लगत्ता, जह से मीणा सकता मने चैतन कौ,
य॒दि चेतन हीजड़दहैतोज्ड मी चेतन है
रत्य वही है, -- दटि मात्र बदली है केवलः
जनान श्र विन्नान एक ही त्त व्िखाते(--
कुहया सा हट यया, मेद सुल गया व्स्वुका।
ज्ञान द िन्नान पथ ही नया पथ है!
सौवण
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2
शम्य नही पथ, अन्य नही पथ, अन्यं नही पथ,
सुला सवै हितमात्र यही चाग्ृहिक पथ ह!
देख रहय मै मनोनयनसे डि मानव को,
लेटा हो बह मह्य ददा मे चोलित तन,
श्रतल िन्धु में चरस, जन कटि उद्र धरा पर
हदय सर्ग मे, मस्तके त्िदिव-त्तितिज से ऊपर /
जाय रहा बहध्यानलीन मी, ष्यानहान मीः?
जय नव मानव की, जय नव विज्नान-न्नान की.
मौतिके पथ ते वदे साथ सामाजिक मानव
प्राध्यालिक, सारछरिक लच्य को-यही साध्य है,
यह तुलम साधन ।- पथ संकट उमयश्रोरहै।
[ जनं कोलाहट का प्रभाव ]
एक स्वर
दैसो, देल, गगन रंग वह, उतर रहा है /
चर॑ति का दृत--उडनं छवी सोले व्ह,
धरती धरती एर पय ८
कर्द खवर
स्वायत, खागत सेचर (*"“
एके स्वर
विना लड्वह्् ह्य, लो, बह चला श्रा रहा /
सल्ल दिसा-युख का अवटुंवन, चम क्तितिकै
अत्णरेव श्रष्रवाधर, मेद॒ रहस्य नील क
कर् स्वर
स्वायत्त हे छात, दिङ् मानव, व्योम जर्यानर ।
र्द द्वार गुल गए हित श्राज ख्यक?
[नरनारी का समवेत गीत ]
श्रभिनदनः वंदन हे
परध्वी के हित सुलला सयका
स्वर्ण क्तितिज तोर हे!
छायः प्रथ एर चले मानव रथ
देख रहा मूमाका इति च्,
धरती के पुर्रो से शोभिते
ग्रह ग्रहक्षा अन हे
सुले र्य मू्जावन वधन
ज़ की सीमा हुई समापन
लगता शुन्य अनंत, सूर्यं से
दीघ, आत्म चेतन है!
विश्व सक्ति हौ व्यक्ति मुक्तिपथ,
मानवता की वहे हे शपथ,
दिग् युग रचना करो, एक हो
व्रि, एक मू-जने है।
ह्ये मौतिकि सरोप्रन स््यत्क,
श्रात्म दीप्ति ्र॑तर् दग जपलकः
मों की शोमा मे सुकुलिते
हले इदि जीवन है
ग्राणो की चिर चंचल पर्य
शुभ्र चेतना की च्रप्तरिया,
भराय रचना मंगल मे
मरी आलिगन हे.
यद च्रभिनंदन हे
५
सौयणं
लेखक
जन्म: २० मद् सन् १९०० ई०,
कू्माचर श्रदेशके अन्तंत ॒प्रकृतिकी
मनोरम क्रोड कौसानी (अलमोडा) मे ।
ठेखन
पर्लव, वाणा, प्रधि, शुजन, युगवाणो,
अभ्या, युगप्थ, स्वणं क्विरण, स्वर्ण-
धृट, उत्तरा, भ्म, चाणी, छख
सीर वृढ! चोद्, दरी वरी : सुनदरी
टेर, { काम्यं संकटन ] रजत श्षिखर,
शिल्पी, सवर्ण, [ काव्य रूपदर ]
उ्योष्स्ना, { नाटक ] एच कदानि्यो,
{कथा संग्रह ] सुभ्व, [अनुवाद] ।
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